मेरठ में गुरुवार को अमर उजाला कार्यालय पहुंचे टोक्यो ओलंपिक जाने वाले खिलाड़ियों के परिजनों ने अपने संघर्ष की कहानियां बयां कीं। खिलाड़ियों को ओलंपिक तक पहुंचने में परिवार के लोगों ने कभी हार न मानते हुए समस्याओं का डटकर सामना किया। खिलाड़ियों को ओलंपिक तक पहुंचने में परिवार के लोगों ने कभी हार न मानते हुए समस्याओं का डटकर सामना किया। संसाधनों की कमी और आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए अपने बच्चों पर विश्वास कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाया। इसी मेहनत का नतीजा है कि दुनिया के सबसे बड़े ओलंपिक गेम्स में मेरठ के पांच खिलाड़ी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाएंगे। वहीं एक पैरा तीरंदाज विवेक चिकारा पैरालंपिक में पदक झटकने को बेताब हैं। खिलाड़ियों के परिजनों ने अमर उजाला के साथ अपने संघर्ष की यादें सांझा कीं। जिसे बताते हुए कई बार खिलाड़ियों के पिता की आंखें भर आईं। उनका विश्वास है कि खिलाड़ी ओलंपिक से पदक जीतकर लौटेंगे।
छोटे नाम बड़े काम: इन 5 खिलाड़ियों के संघर्ष की कहानियां सुन भर आईं आंखें, अब टोक्यो में दिखाएंगे दम, एडीजी बोले...
बेटियों को बेटों से ऊपर समझो
20 किलोमीटर पैदलचाल में टोक्यो ओलंपिक खेलने जा रहीं माधवपुरम निवासी प्रियंका के पिता मदनपाल गोस्वामी ने कहा कि बेटियों को बेटों से ऊपर समझोगे तभी सफलता मिलेगी। बताया भाई के यहां बेटा हुआ तो सभी ने कहा आपके यहां भी बेटा हो जाता, लेकिन मैं और मेरी पत्नी अनिता ने प्रियंका को बेटों से भी ऊपर माना। आज उसने वो कर दिया जो बेटे भी नहीं कर पाते। ये बताते हुए मदनपाल गोस्वामी भावुक हो गए। पटियाला में रहते हुए आर्थिक समस्या के चलते एक समय का खाना गुरुद्वारे में खाया, लेकिन अपने खेल से कभी समझौता नहीं किया।
गुरुकुल प्रभात आश्रम से मिला सहयोग
सरधना के बहादरपुर गांव निवासी भाला फेंक खिलाड़ी अन्नू रानी के पिता अमरपाल सिंह ने बताया गुरुकुल प्रभात आश्रम टिकरी से उन्हें बहुत सहयोग मिला। अन्नू के घुटने में दिक्कत आई तो कोच ने खेलने को मना कर दिया। लेकिन स्वामी विवेकानन्द सरस्वती ने अन्नू का मार्गदर्शन किया तो फिर से खेलों में आई। स्वामी जी ने आर्थिक स्थिति को देखते हुए अन्नू का खेल प्रभावित न हो गाय भी दान की। जो आज भी घर पर बंधी है। बताया मैं अन्नू के खेल से खुश नहीं था, लेकिन उसकी मेहनत ने मुझे भी बदल दिया। उनके साथ आए अन्नू के दादा विक्रम सिंह ने कहा 15-16 किलोमीटर दूर खेलने आती थी। अन्नू ने बहुत परिश्रम किया। भाला नहीं था तो बांस से अभ्यास किया। उन्होंने अन्नू सहित सभी खिलाड़ियों को स्वर्ण पदक जीतने की शुभकामना दी।
एक्सीडेंट में पैर गंवाया पर हौसला नहीं
पैरा तीरंदाज विवेक चिकारा का 2017 में एक्सीडेंट हो गया, जिसमें एक पैर गंवाना पड़ा। उनके पिता देवेंद्र सिंह ने बताया एक साल तक घर में गमगीन माहौल रहा। गुरुकुल प्रभात आश्रम पहुंचा तो कोच सत्यदेव प्रसाद ने प्रतिभा को पहचाना और तीरंदाज बनाया। खेलों में जाने के लिए नौकरी कुर्बान कर दी। आज टोक्यो पैरालंपिक में जगह बनाई है। कहा उसके संघर्ष की बात करता हूं तो आंखें भर आती हैं। उनके साथ चाचा प्रमोद सिंह मौजूद रहे।
प्रियंका जैसी लगनशील लड़की नहीं देखी
कोच गौरव त्यागी ने कहा 2010-11 में अभ्यास के दौरान उन्होंने प्रियंका की लगन देखी। दौड़ते समय अगर ध्यान इधर-उधर हो गया तो उसने अभ्यास नहीं छोड़ा। प्रियंका को जिम्नास्टिक से वो एथलेटिक में लेकर आए। जबकि उसकी क्षमता को देखते हुए 10 किलोमीटर दौड़ से 20 किलोमीटर पैदल चाल स्पर्धा में मौका दिया। जिसको प्रियंका ने साबित कर मेरठ का नाम रोशन किया। परिवार ने मुजफ्फरनगर के गांव का घेर बेचकर उसके सपनों को साकार किया। बच्चों को ओलंपिक पोडियम पर देखूंगा तो लगेगा मैं ही वहां खड़ा हूं।