संघ के हिंदुत्व का एजेंडा अब विस्तार ले चुका है। लेकिन इस हिंदुत्व के एजेंडे में सबसे पहले जातीय विद्वेष की बढ़ती खाई के साथ भाषा, क्षेत्र और पूजा पद्धति को लेकर हो रहे संघर्ष को दूर कर उसे पाटना है। सरसंघ चालक अपने 35 मिनट के संबोधन में यही संदेश देते नजर आए।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
- फोटो : अमर उजाला
डॉ. मोहनराव भागवत का संबोधन पूरी तरह आपसी भेदभाव मिटाने पर केंद्रित रहा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बढ़ते जातीय संघर्ष को देखते हुए बनायी गयी रणनीति के मद्देनजर जिस सोच के साथ राष्ट्रोदय का आयोजन मेरठ प्रांत में किया गया था। सर संघ चालक के संबोधन में वह एजेंडा साफ नजर आया।
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आरएसएस कार्यकर्ता
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उन्होंने बिना किसी का नाम लिए विपक्षियों से भी सतर्क रहने को कहा। डॉ. भागवत ने कहा कि विघटनकारी ताकते हमें एक होते नहीं देखना चाहती हैं, क्योंकि हम एक हुए तो उनका हित सिद्ध नहीं होगा।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
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उन्होंने देश की विविधता में पैदा हो रही दूरियों को पाटने का संदेश देते हुए कहा कि विविधता हमारी ताकत है। क्योंकि जिन देशों ने अपनी एक भाषा और एक पूजा पद्धति को अपनाया, वह आगे नहीं बढ़ सके। जबकि हमारा देश आज भी आठ हजार साल पुराने राम जैसे राजा और उनके परिवार की संस्कृति को अपनाए हुए है।
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आरएसएस कार्यकर्ता
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डॉ. भागवत ने हिंदुत्व का एजेंडा भी प्रमुखता से रखा। लेकिन इस हिंदुत्व में उन्होंने धार्मिक भावनाओं को बिल्कुल दरकिनार कर उसे राष्ट्रीयता और संस्कृति जोड़ने की कोशिश की। साफ कहा कि हम हिंदू है और यह गर्व की बात है। ऐसे में साफ हो गया कि संघ अपने हिंदुत्व के एजेंडे पर कायम है। लेकिन अब उसे दलित, अति पिछड़ा, बौद्ध, जैन आदि धर्मां तक ले जाना चाहता है।