एक लड़की के पैरों में परेशानी है। वह परिवार की एक महिला के साथ जा रही है। उसे सड़क पर घिसटकर चलना पड़ रहा है। उसे न स्ट्रेचर मिला और न ही व्हील चेयर। आते जाते लोग भी उनसे पूछते हैं कि क्या दिक्कत है। उसे घिसटते-घिसटते अस्पताल के बाहर तक जाना पड़ता है। तस्वीरों में साफ बयां हो रही ये हकीकत मेरठ के जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज की हैं -
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medical college meerut, hospital
- फोटो : अमर उजाला
बुजुर्ग को कंधे का ही मिला सहारा
जिला अस्पताल में वृद्ध को परिवार के लोग स्ट्रेचर नहीं मिलने पर कंधों के सहारे लेकर जा रहे हैं। इस बीच वे कई बार रुकते भी हैं। वृद्ध कहते हैं कि उनसे चला नहीं जा रहा। परिवार के लोग उनकी हिम्मत बंधाते हैं कि थोड़ी ही दूर जाना है। जैसे-तैसे बुजुर्ग एक-एक कदम गिन गिन कर चलते हैं।
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रोज मिलते हैं ऐसे मामले
महज नौ मिनट के अंदर ली गईं ये दो तस्वीरें जिला अस्पताल के हालात बयां कर रही हैं। ये तो उदाहरण भर है। यहां हर रोज ऐसे मामले देखने को मिलते हैं।
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एक तरफ केंद्र और सूबे की सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का दावा कर रही है, वहीं सरकारी अस्पतालों में मरीजों को छोटी-छोटी सुविधाएं भी मुहैया नहीं हो रही हैं। जिला अस्पताल हो या मेडिकल कॉलेज, दोनों जगह एक जैसी स्थिति है।
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बीमार व्यक्ति को पैदल लेजाते तीमारदार व खुद स्ट्रेचर पर मरीज
- फोटो : अमर उजाला
मेडिकल कॉलेज में भी स्ट्रेचर पर ताले लगे रहते हैं। जिला अस्पताल में स्ट्रेचर ढूंढे नहीं मिलता है। मरीज परिजनों के हाथों और कंधों के सहारे रहते हैं। कई बार तो ड्रिप तक हाथों पर लेकर चलनी पड़ती है।