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Kargil Vijay Diwas: मेरठ के वीर सपूतों के शौर्य को नमन, आज जवानों को शीश नवाएंगे शहरवासी
Wed, 26 Jul 2023 12:15 PM IST
Dimple Sirohi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
Published by: Dimple Sirohi
Updated Wed, 26 Jul 2023 12:15 PM IST
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Kargil Vijay Diwas
- फोटो : Amar Ujala
कारगिल का रण मेरठ के वीर सपूतों की बहादुरी का गवाह है। हर साल 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस पर इन जवानों के शौर्य को नमन किया जाता है। अपनों को खोने वाले परिवारों का सीना अब भी गर्व से चौड़ा हो जाता है। शहीदों के परिवारों का ऋण ये देश कभी नहीं चुका पाएगा।
शहीद मेजर मनोज तलवार का फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
तिरंगा फहराकर शहीद हुए मेजर मनोज तलवार
मवाना रोड स्थित डिफेंस कालोनी ए-34 निवासी मेजर मनोज तलवार की फरवरी 1999 में फिरोजपुर पंजाब में तैनाती हुई। वे देश के लिए कुछ करना चाहते थे, उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति की मांग कर दी। कारगिल में युद्ध हुआ तो उनकी बटालियन को भेजा गया। 13 जून को उन्होंने कारगिल सेक्टर टिकटोक में तिरंगा फहरा दिया। इसी बीच दुश्मन की तोप के गोले के वह शहीद हो गए। उनके पिता रिटायर्ड कैप्टन पीएस तलवार का कुछ दिन पहले ही निधन हो चुका है। मां ऊषा तलवार का निधन कई वर्ष पहले हो गया था। परिवार में छोटे भाई और बहनें हैं।
मवाना रोड स्थित डिफेंस कालोनी ए-34 निवासी मेजर मनोज तलवार की फरवरी 1999 में फिरोजपुर पंजाब में तैनाती हुई। वे देश के लिए कुछ करना चाहते थे, उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति की मांग कर दी। कारगिल में युद्ध हुआ तो उनकी बटालियन को भेजा गया। 13 जून को उन्होंने कारगिल सेक्टर टिकटोक में तिरंगा फहरा दिया। इसी बीच दुश्मन की तोप के गोले के वह शहीद हो गए। उनके पिता रिटायर्ड कैप्टन पीएस तलवार का कुछ दिन पहले ही निधन हो चुका है। मां ऊषा तलवार का निधन कई वर्ष पहले हो गया था। परिवार में छोटे भाई और बहनें हैं।
हवलदार यशवीर सिंह
- फोटो : अमर उजाला
यशवीर सिंह दुश्मनों पर भारी पड़े
मूलरूप से बागपत के सिरसली और अब रोहटा बाईपास निवासी हवलदार यशवीर सिंह की बटालियन को तोलोलिंग का टास्क दिया गया था। 12 जून को टू-राजपूताना राइफल ने मेजर विवेक गुप्ता के नेतृत्व में 90 जवानों ने इस प्वाइंट पर हमला बोल दिया। प्वाइंट 4950 पर कब्जे को भीषण युद्ध हुआ। हवलदार यशवीर सिंह ने सीने पर गोलियां लगने के बावजूद ग्रेनेड के साथ पाकिस्तानी सेना के बंकरों पर हमला कर दिया। 40-50 दुश्मनों को मारकर वे शहीद हो गए। 13 जून 1999 को तोलोलिंग पर भारतीय सेना ने तिरंगा फहरा दिया। जब वे शहीद हुए थे तो छोटा बेटा आठ साल और बड़ा 12 साल का था। उन्हें मरणोपरांत वीरचक्र से अलंकृत किया गया।
मूलरूप से बागपत के सिरसली और अब रोहटा बाईपास निवासी हवलदार यशवीर सिंह की बटालियन को तोलोलिंग का टास्क दिया गया था। 12 जून को टू-राजपूताना राइफल ने मेजर विवेक गुप्ता के नेतृत्व में 90 जवानों ने इस प्वाइंट पर हमला बोल दिया। प्वाइंट 4950 पर कब्जे को भीषण युद्ध हुआ। हवलदार यशवीर सिंह ने सीने पर गोलियां लगने के बावजूद ग्रेनेड के साथ पाकिस्तानी सेना के बंकरों पर हमला कर दिया। 40-50 दुश्मनों को मारकर वे शहीद हो गए। 13 जून 1999 को तोलोलिंग पर भारतीय सेना ने तिरंगा फहरा दिया। जब वे शहीद हुए थे तो छोटा बेटा आठ साल और बड़ा 12 साल का था। उन्हें मरणोपरांत वीरचक्र से अलंकृत किया गया।
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फतह के बाद शहीद हुए सत्यपाल सिंह
- फोटो : Amar Ujala Meerut
राजपूताना राइफल्स से कारगिल पहुंचे थे सत्यपाल सिंह
मूलरूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांसनायक सत्यपाल सिंह का जनवरी 1999 में जम्मू तबादला हुआ था। इसी बीच कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को कारगिल पहुंचने का आदेश मिला। तोलोलिंग जीतने के बाद 28 जून को दुश्मनों से लड़ते हुए वो द्रास सेक्टर में शहीद हो गए। बड़ा बेटा पुलकित साढ़े तीन साल और बेटी दिव्या ढाई साल की थी। युद्ध के तीन दिन पहले पत्नी से बातचीत में उन्होंने स्वयं यह नहीं बता रहे थे कि वह युद्ध क्षेत्र में हैं। जोर डालने पर बताया और बोले कि वह 16-17 जुलाई तक घर लौट आएंगे। उनके बलिदान होने की सूचना स्वजन ने एक-दूसरे से एक जुलाई को पार्थिव देह घर पहुंचने तक छिपाए रखा। बलिदानी सत्यपाल सिंह को मरणोपरांत सेना मेडल से अलंकृत किया गया।
मूलरूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांसनायक सत्यपाल सिंह का जनवरी 1999 में जम्मू तबादला हुआ था। इसी बीच कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को कारगिल पहुंचने का आदेश मिला। तोलोलिंग जीतने के बाद 28 जून को दुश्मनों से लड़ते हुए वो द्रास सेक्टर में शहीद हो गए। बड़ा बेटा पुलकित साढ़े तीन साल और बेटी दिव्या ढाई साल की थी। युद्ध के तीन दिन पहले पत्नी से बातचीत में उन्होंने स्वयं यह नहीं बता रहे थे कि वह युद्ध क्षेत्र में हैं। जोर डालने पर बताया और बोले कि वह 16-17 जुलाई तक घर लौट आएंगे। उनके बलिदान होने की सूचना स्वजन ने एक-दूसरे से एक जुलाई को पार्थिव देह घर पहुंचने तक छिपाए रखा। बलिदानी सत्यपाल सिंह को मरणोपरांत सेना मेडल से अलंकृत किया गया।
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शहीद ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह
- फोटो : अमर उजाला
दिल में देशभक्ति का जज्बा लिए शहीद हुए योगेंद्र सिंह
हस्तिनापुर में पाली गांव निवासी सिपाही योगेंद्र सिंह भी 18 ग्रेनेडियर बटालियन में परमवीर चक्र सम्मानित योगेंद्र सिंह के साथ आपरेशन में शामिल थे। वह द्रास सेक्टर में टाइगर हिल की अंतिम चढ़ाई पर एक अफसर, एक जेसीओ व 19 जवानों के साथ थे। पांच जुलाई को रात के अंधेरे में वह आगे बढ़ रहे थे। टाइगर हिल से महज 50-60 मीटर दूरी पर पौ फूटते ही दुश्मन ने दोनों ओर से हमला कर दिया। उस गोलीबारी के बीच केवल सात जवान ही चोटी पर पहुंच सके जिसमें योगेंद्र सिंह भी थे। उन्होंने गोलीबारी रोक दी तो दुश्मन देखने नीचे उतरा। 15-20 लोग पास पहुंचे तो उन्होंने हमला कर दिया और 17 लोगों को मार गिराया। जवाबी फायरिंग में दुश्मन ने पूरी ताकत झोंक दी और सभी जवान एक-दूसरे की मदद करते हुए बलिदान हो गए। उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से नवाजा गया।
हस्तिनापुर में पाली गांव निवासी सिपाही योगेंद्र सिंह भी 18 ग्रेनेडियर बटालियन में परमवीर चक्र सम्मानित योगेंद्र सिंह के साथ आपरेशन में शामिल थे। वह द्रास सेक्टर में टाइगर हिल की अंतिम चढ़ाई पर एक अफसर, एक जेसीओ व 19 जवानों के साथ थे। पांच जुलाई को रात के अंधेरे में वह आगे बढ़ रहे थे। टाइगर हिल से महज 50-60 मीटर दूरी पर पौ फूटते ही दुश्मन ने दोनों ओर से हमला कर दिया। उस गोलीबारी के बीच केवल सात जवान ही चोटी पर पहुंच सके जिसमें योगेंद्र सिंह भी थे। उन्होंने गोलीबारी रोक दी तो दुश्मन देखने नीचे उतरा। 15-20 लोग पास पहुंचे तो उन्होंने हमला कर दिया और 17 लोगों को मार गिराया। जवाबी फायरिंग में दुश्मन ने पूरी ताकत झोंक दी और सभी जवान एक-दूसरे की मदद करते हुए बलिदान हो गए। उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से नवाजा गया।