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भारत-चीन तकरार: 1962 में नंगे पांव और भूखे लड़े हमारे सैनिक, इक्युपमेंट थे और न थी भोजन-पानी की व्यवस्था

Wed, 17 Jun 2020 08:00 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुजफ्फरनगर Published by: Dimple Sirohi Updated Wed, 17 Jun 2020 08:00 PM IST
सार

- चीन के साथ हुए युद्ध में लड़े थे कर्नल धर्मवीर सिंह
- न इक्युपमेंट थे और न भोजन, पानी की व्यवस्था थी
-हमारे सैनिक चीनी सैनिकों से बहादुर, सही जवाब दिया 

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India-China dispute: In 1962, our soldiers fought barefoot and hungry
परमवीर चक्र विजेता कर्नल धर्मवीर सिंह व साथ में महेंद्र फौजी पांव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भारत-चीन सीमा पर सैनिकों के साथ झड़प में सेना के अधिकारी समेत बीस जवानों के शहीद होने के बाद सेना के पूर्व सैनिकों में चीन के खिलाफ जमकर गुस्सा है। उनका कहना है कि चीन जैसे दगाबाज देश पर विश्वास नहीं किया जा सकता।

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चीन ने जो विश्वासघात भारत के साथ किया है देश की सेना पहले की तरह उसका मुंह तोड़ जवाब देकर सबक सिखाएगी। यूपी के मुजफ्फरनगर के रहने वाले परमवीर चक्र विजेता कर्नल धर्मवीर सिंह ने 1962 में भारत चीन के बीच हुए युद्ध की कुछ यादें साझा की।
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वर्ष 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में लड़े कर्नल धर्मवीर सिंह का कहना है कि हम उस समय विपरित परिस्थितियों में लड़े। हम लोगों के पास न तो बर्फ पर चलने और पहाड़ पर चढने वाले जूते थे और न ही अच्छे हथियार। भोजन के नाम पर सैनिकों को केवल चार-पांच दिन के शक्करपारे दिए गए। हमारे सैकड़ों सैनिक मच्छरों के काटने से मलेरिया से पीड़ित हो गए थे। 
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जिले के गांव भमेला निवासी कर्नल धर्मवीर सिंह 1960 में सेना में भर्ती हुए थे। वह चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्घ में 1962, 1965 और 1971 में जाबांजी के साथ लड़े। उन्हें भारत सरकार ने परमवीर चक्र भी दिया। 25 साल तक सेना में रहकर सेवा करने वाले धर्मवीर सिंह कहते है कि 1962 में सरकार और सेना दोनों की ही लड़ाई की तैयारी नहीं थी।  

पहाड़ों पर चढने के लिए सामान्य जूते सैनिकों को दिए गए जो चार-पांच किमी ऊपर चढते ही फट गए। हमारे अधिकतर सैनिक नंगे पांव ही लड़ाई लड़े। ऐसे सैनिकों की संख्या भी कम नहीं थी जो भूखे ही लड़ रहे थे।

जिले के गांव भमेला निवासी कर्नल धर्मवीर सिंह 1960 में सेना में भर्ती हुए थे। वह चीन और पाकिस्तान के साथ हुए युद्घ में 1962, 1965 और 1971 में जाबांजी के साथ लड़े। उन्हें भारत सरकार ने परमवीर चक्र भी दिया। 25 साल तक सेना में रहकर सेवा करने वाले धर्मवीर सिंह कहते है कि 1962 में सरकार और सेना दोनों की ही लड़ाई की तैयारी नहीं थी।  

पहाड़ों पर चढने के लिए सामान्य जूते सैनिकों को दिए गए जो चार-पांच किमी ऊपर चढते ही फट गए। हमारे अधिकतर सैनिक नंगे पांव ही लड़ाई लड़े। ऐसे सैनिकों की संख्या भी कम नहीं थी जो भूखे ही लड़ रहे थे।

भोजन के नाम पर सैनिकों की जेब में शक्करपारे दे दिए गए थे। वितरित हालातों में हमारे सैनिक बहादुरी के साथ लड़े। मौसम ऐसा था कि हमारे सैनिकों को मच्छरों ने काट लिया, इसके बचाव के उपाय सेना के पास नहीं थे। एक साथ बडी संख्या में सैनिक मलेरिया की चपेट में आ गए।

हमारे सैनिकों के पास लड़ने के लिए मस्कट थी। चीनी सैनिकों के पास हमारे से आधुनिक हथियार थे। इक्युपमेंट के मामले में हम काफी पीछे थे। वे कहते है, मुझे इस बात की खुशी है कि आज देश के हालात बदले हैं।

हमारे सैनिकों को आवश्यकता के हिसाब से सुविधाएं मिल रही है। अब हम चीन से किसी भी तरह कमजोर नहीं है। हमारे सैनिक, चीनी सैनिकों से बहादुर है। चीन कुछ दिनों से सीमा रेखा पर दखल अंदाजी कर रहा था। भारतीय सैनिकों ने सही जवाब दिया। 
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