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1971 की जंग में '17 पूना हॉर्स' ने रचा था इतिहास, 21 साल के इस जांबाज ने बदल दी थी युद्ध की तस्वीर

Sun, 16 Dec 2018 11:20 AM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Priyesh Mishra Updated Sun, 16 Dec 2018 11:20 AM IST
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1971 Indo Pak war, Lieutenant Arun Khetarpal from 17 Poona Horse regiment created history
17 पूना हॉर्स रेजीमेंट
भारतीय सेना की विभिन्न रेजीमेंट में से एक नाम ऐसा है जिसके नाम से दुश्मन खौफ खाते हैं। हम बात कर रहे हैं 17 पूना हॉर्स रेजीमेंट की। इसके जियालों ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तानी सेना के 48 पैटन टैंक को ध्वस्त कर उसे भागने पर मजबूर कर दिया। परमवीर चक्र विजेता 21 साल के लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल ने पराक्रम दिखाते हुए युद्ध की तस्वीर बदल दी थी। हर साल सेना 16 दिसंबर के दिन बसंतर की जीत का जश्न मनाते हुए ऐसे वीर जियालों को पुष्प चक्र अर्पित कर उनकी बहादुरी की कहानियां आने वाली पीढ़ी को सुनाती है। रेजीमेंट में शनिवार से तीन दिन तक खास कार्यक्रमों का आयोजन होगा। जानें इस रेजीमेंट से जुड़ी कुछ रोचक बातें :-


 
1971 Indo Pak war, Lieutenant Arun Khetarpal from 17 Poona Horse regiment created history
अरुण खेत्रपाल

पूना हॉर्स के ही सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल इस रेजीमेंट की बहादुरी का दूसरा बड़ा उदाहरण हैं। लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल मात्र अपनी छ माह की सर्विस में केवल 21 वर्ष की उम्र में 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में देश के लिए शहीद हो गये। वह 1971 में भारत-पाक युद्ध के दौरान बसंतर में बटालियन की कमान संभाल रहे थे यहां उन्होंने अकेले ही पाक सेना की नाक में दम कर दिया। 16 दिसंबर 1971, जगह थी शकरगढ़ सेक्टर, पंजाब। 17 पूना हॉर्स को फॉरवर्ड मार्च से जरूरी आदेश मिले। कर्नल हनूत सिंह उर्फ हंटी अपने अफसरों-जवानों और टैंकों के बेड़े के साथ निकल पड़े। उनके साथ 21 साल के सेकेंड लेफ्टिनेट अरुण खेत्रपाल भी थे। इनको कायदे से वहां नहीं होना चाहिए था, क्योंकि यूनिट में उनकी ट्रेनिंग पूरी होने में कुछ वक्त बाकी था, लेकिन मातृभूमि के लिए समर्पित, सैनिक पृष्ठभूमि और जंग में कुछ कर दिखाने वाले अरुण खेत्रपाल ट्रेनिंग कमांडर से खास इजाजत लेकर लड़ाई के मैदान में आ गए।

1971 Indo Pak war, Lieutenant Arun Khetarpal from 17 Poona Horse regiment created history
17 पूना हॉर्स रेजीमेंट

बसंतर नदी शकरगढ़ नाम के एक रणनीतिक सेक्टर से होकर बहती है। पाकिस्तान का प्लान था कि इस पर बने एक पुल को कब्जे में लेकर जम्मू कश्मीर को पठानकोट से अलग-थलग कर दिया जाए, इससे वहां से सेना जम्मू न पहुंच सके और कश्मीर पर कब्जा किया सके।

16 दिसंबर को पाकिस्तान ने शकरगढ़ में लैंडमाइंस बिछा रखी थीं। जिनका मकसद भारतीय टैंकों को आगे बढ़ने से रोकना था। कर्नल हंटी ने अरुण और दूसरे अफसर को अपने टैंक लेकर नदी पार करते हुए दुश्मन के इलाके जरपाल में घुसने का हुक्म दिया। बहादुर अफसर अपने टैंकों की रफ्तार तेज करते हुए आगे बढ़े कि रीकॉइल गन्स के साथ सिपाही और पाकिस्तान के पैटन टैंक उनके इंतजार में थे। लड़ाई छिड़ गई। भारतीयों ने पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे खदेड़ दिया और उनके टैंक ध्वस्त कर दिए। इस दौरान अरुण के साथी अफसर शहीद हो गए।

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1971 Indo Pak war, Lieutenant Arun Khetarpal from 17 Poona Horse regiment created history
17 पूना हॉर्स रेजीमेंट

अकेले रह गए थे अरुण
सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल दुश्मन के इलाके में अकेले रह गए थे। तभी सामने से 14 पाकिस्तानी टैंकों की स्क्वाड्रन तैयार थी। अरुण अकेले ही उनसे भिड़ गए। इसी दौरान दुश्मन के एक टैंक ने उनके टैंक पर गोले दागकर आग लगा दी। अरुण ने अपनी पोजीशन कर्नल हंटी को वायरलैस के जरिये बताई तो उन्होंने अरुण को वापस आने का हुक्म दिया। लेकिन अरुण तैयार नहीं हुए। उन्होंने कहा कि सर, मेरे टैंक की गन अभी काम कर रही है। मैं दुश्मनों को गिराकर ही आऊंगा। यह कहने के बाद उन्होंने अपने ड्राइवर नत्थू सिंह को रेडियो सेट ऑफ करने के लिए कह दिया।

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1971 Indo Pak war, Lieutenant Arun Khetarpal from 17 Poona Horse regiment created history
17 पूना हॉर्स

दो टैंक किए धराशायी
21 साल के अरुण खेत्रपाल ने वीरता दिखाते हुए दो और पाकिस्तानी टैंक धराशायी कर दिए। तभी एक गोला अरुण के टैंक पर गिर गया और वे शहीद हो गए। वे सैनिक परिवार से थे। उनके दादा पहले विश्व युद्ध और पिता दूसरे विश्व युद्ध और 1965 के युद्ध में लड़ चुके थे। अरुण खेत्रपाल को उनके अदम्य साहस और नेतृत्व क्षमता के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया। वे सबसे कम उम्र के भारतीय थे, जिन्हें यह सम्मान मिला।

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