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झकझोर देंगी ये तस्वीरें: संसाधन नहीं, आंकड़ेबाजी में भी सौदागिरी, श्मशान घाटों में बढ़ रही चिताओं की संख्या

Sun, 25 Apr 2021 09:12 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर Published by: शिखा पांडेय Updated Sun, 25 Apr 2021 09:12 AM IST
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Do not have the resources to defeat corona, coronavirus news
दिल दहला देने वाला है घाटों का मंजर - फोटो : अमर उजाला
केस-1 

यशोदा नगर निवासी कमलकांती कोरोना संक्रमित थीं। घर पर ही इलाज करवा रही थीं। आखिरी समय परिजन हैलट लेकर गए। वहां डॉक्टरों ने भर्ती किए बिना ही मृत घोषित कर दिया। परिवारीजन शव वैसे ही लेकर चले आए। हैलट के डॉक्टरों ने अपने बचाव में शव को कोविड नियमों के तहत न तो सील किया ही उनका अंतिम संस्कार कोविड नियमों की तरह हुआ। भगवतदास घाट में उनकी लकड़ी पर चिता लगाई गई। 

केस-2 
बर्रा के रमाशंकर यादव की पत्नी में कोरोना संक्रमण जैसे लक्षण थे। सांसें घटती जा रही थीं। चूंकि रिपोर्ट निगेटिव थी इसलिए उन्हें कहीं इलाज नहीं मिला। कोविड कमांड सेंटर से उन्हें मदद नहीं मिली। वे स्वयं प्रिया अस्पताल ले गए तो उन्हें वापस कर दिया गया। आखिरकार रमाशंकर की पत्नी की जान चली गई। रमाशंकर कहते हैं कि पत्नी को भर्ती कर उनका एक्सरे या सीटी स्कैन होता तो वे संक्रमित निकलतीं। 

कानपुर में कोरोना को हराने के लिए स्वास्थ्य विभाग संसाधनों का इस्तेमाल न करके आंकडे़ेबाजी का खेल कर रहा है। बर्रा के रमाशंकर यादव की पत्नी और यशोदा नगर की कमलकांती की मौत इसका सटीक उदाहरण है। दोनों कोरोना संक्रमितों में दर्ज नहीं हैं। मगर मौत की वजह कोरोना संक्रमण ही है।
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दिल दहला देने वाला है घाटों का मंजर - फोटो : amar ujala
इन दोनों की तरह ही कानपुर में सैकड़ों लोग बिना सरकारी आंकड़ों में दर्ज हुए मौत के मुंह में समा चुके हैं। यही वजह है कि शहर के श्मशान घाटों में चिताओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। मार्च माह में श्मशान घाट में आए शवों की तुलना में अप्रैल में कई गुना अधिक चिताएं जली हैं।
 
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रात को भी जली चिताएं - फोटो : amar ujala
श्मशान घाट के सूत्र खुद ही सरकारी आंकड़ों की चुगली करते हैं। कहते हैं जितने भी शव आ रहे हैं उनमें 70 फीसदी कोरोना संक्रमितों के होते हैं। मगर उनके शव कोविड-19 गाडइ लाइन का पालन करके नहीं भेजे जाते। बहुत से कोरोना संक्रमितों की मौत घरों में हो रही है।

 
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शवों की लगी हैं लंबी कतारें - फोटो : अमर उजाला
वे सीधे श्मशानघाट आ रहे हैं। इनकी मौत को सरकारी आंकड़ों में दर्ज करने का कोई विधान नहीं है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग की ओर से रोज रात को जारी होेने वाली कोरोना मृतकों की संख्या हकीकत में सही नहीं होती।

 
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बिठूर घाट का खौफनाक मंजर - फोटो : amar ujala
सही तो तब होती जब बिना ऑक्सीजन अस्पताल की देहरी पर दम तोड़ने वालों, बेड न मिलने से सड़कों पर मरने वालों और घरों में तड़प तड़प कर मरने वालों का आंकड़ा भी शामिल कर लिया जाता। स्वास्थ्य विभाग इस सवाल के जवाब में मौन है। हकीकत तो सिर्फ श्मशान घाट में लगी चिताओं की लंबी लाइनें ही बयां कर रही हैं। 

व्यवस्था के मुताबिक वही मौतें रिकार्ड में दर्ज हो पाती हैं जो अस्पतालों में हुईं। निश्चित रूप से कुछ मौतें बिना जानकारी के भी हुई होंगी। ये महामारी का दौर है। शासन प्रशासन का प्रयास है कि सभी संक्रमितों को बेहतर इलाज मिले। इसके लिए युद्धस्तर पर प्रयास कर रहे हैं। हमारी व्यवस्था इस तरह की महामारी से निपटने के लिए तैयार नहीं थी। इसमें हर व्यक्ति का सहयोग चाहिए। सभी को कोविड गाइड लाइन का पालन सख्ती से करना होगा। - आलोक तिवारी, जिलाधिकारी

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