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क्यों मनाया जाता है करवाचौथ, क्या है इस व्रत की विधि, पढ़ें इसके बारे में सबकुछ
Mon, 14 Oct 2019 01:05 PM IST
Prachi Priyam
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गोरखपुर
Published by: Prachi Priyam
Updated Mon, 14 Oct 2019 01:05 PM IST
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करवा चौथ
अखंड सुहाग के लिए रखा जाने वाले करवाचौथ का व्रत इस बार 17 अक्तूबर को मनाया जाएगा। इस दिन सुहागिनें दिन भर भूखी-प्यासी रहकर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करतीं हैं। यही नहीं, कुंवारी लड़कियां भी मनवांछित वर के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। पूरे विधि-विधान से माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने के बाद करवा चौथ की कथा सुनी जाती है। फिर रात के समय चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही यह व्रत संपन्न होता है।
करवा चौथ
पंडित शरद चंद्र मिश्र ने बताया कि इस दिन सूर्योदय 6 बजकर 17 मिनट पर होगा। चतुर्थी तिथि का मान पूरे दिन और रात्रिशेष (अगले दिन सुबह) 5 बजकर 28 मिनट तक है। कृतिका नक्षत्र दिन में 3 बजकर 25 मिनट के बाद रोहिणी नक्षत्र योग व्यतिपात और वरियान दोनों हैं। चंद्रमा वृषभ राशि पर उच्च स्थिति में है।
करवा चौथ
पुराणों के अनुसार चंद्रमा नक्षत्रों में रोहिणी नक्षत्र को अत्यधिक प्रेम करता है। उसकी स्थिति इसी नक्षत्र पर होने से वह प्रेम प्रवर्धन की समृद्धि करने वाला योग निर्मित कर रहा है। यह व्रत सुहागिनें अपने पति के मंगल और समृद्धि के लिए करती हैं। करवाचौथ के दिन 17 अक्टूबर को चंद्रोदय 7 बजकर 59 मिनट पर है। इसी समय अर्घ्य दिया जाएगा ।
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करवा चौथ
करवा पूजन विधि
पंडित घनश्याम पांडेय ने बताया कि करवाचौथ का चित्र दीवार या कागज पर बनाया जाता है जिसमें सूर्य, चंद्रमा, गंगा, यमुना, भाई-बहन, हरि-गौर आदि के चित्र बनाए जाते हैं। चंद्रोदय से पूर्व पूजास्थल, रंगोली या अल्पना से सजाया जाता है। एक-एक करवा टोटीदार उरई की पांच या सात सींक डालकर रखा जाता है।
पंडित घनश्याम पांडेय ने बताया कि करवाचौथ का चित्र दीवार या कागज पर बनाया जाता है जिसमें सूर्य, चंद्रमा, गंगा, यमुना, भाई-बहन, हरि-गौर आदि के चित्र बनाए जाते हैं। चंद्रोदय से पूर्व पूजास्थल, रंगोली या अल्पना से सजाया जाता है। एक-एक करवा टोटीदार उरई की पांच या सात सींक डालकर रखा जाता है।
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करवा चौथ
यदि पहली बार करवाचौथ पर चांदी या सोने का करवा पूजा जाए तो प्रत्येक बार उसी की पूजा होती है, फिर रात्रि में चंद्रमा निकलने पर चंद्र दर्शन कर अर्घ्य दिया जाता है। चंद्रमा के चित्र पर निरंतर धारा छोड़ी जाती है तथा सुहाग तथा समृद्धि की कामना की जाती है । बुजुर्गों के चरणस्पर्श कर बेसन की पूरी, मीठा गुलगुला व अन्य पकवान प्रसाद में चढ़ाए जाते हैं।