गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती के संगम किनारे मकर संक्रांति स्नान पर्व पर पुण्य की डुबकी के साथ माघ मेले का शुभारंभ हो गया। घने कोहरे के बीच पूस की ठिठुरती भोर में संगम स्नान के लिए जुटे श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बना। अमृतमयी संगम की धारा में लाखों श्रद्धालुओं ने गोता लगाकर तन-मन को धन्य किया। देर शाम तक मेला क्षेत्र में श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम जारी रहा।
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prayagraj news : मकर संक्रांति पर प्रयागराज माघ मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।
- फोटो : prayagraj
बृहस्पतिवार की सुबह 8:14 बजे इस साल के ग्रहों के राजा सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ ही स्नान का पुण्यकाल आरंभ हो गया। इससे पहले भोर में ही एक किमी लंबा संगम घाट आस्थावानों की भीड़ से खचाखच भर गया। काली सड़क और लाल सड़क से लोग कतारबद्ध होकर झोला, गठरी लेकर संगम की ओर बढ़ते रहे।
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prayagraj news : संगम स्नान के बाद माथे पर चंदन का लेप लगवाती युवती।
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काली सड़क तिराहे से ही बारिकेडिंग कर संगम जाने का मार्ग वन-वे कर दिया गया था। कोई बुजुर्ग माता -पिता को स्नान कराकर पुण्य बटोरने निकला तो कोई पत्नी-बच्चों को लेकर। भीड़ में बिछुड़ने की चिंता की वजह से एक-दूसरे का हाथ थाम कर भी लोग चलते रहे, ताकि साथ न छूटने पाए। पौ फटने के साथ महावीर पांटून पुल से लेकर अकबर के किला स्थितत वीआईपी घाट तक एक किमी लंबे घाट के सामन बनी सर्क्युलेटिंग एरिया में कहीं भी खड़ा होने की जगह नहीं बची।
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prayagraj news : संगम स्नान के बाद पूजन करते साधु-संत।
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किसी के कपड़े खोते रहे तो किसी का झोला। लोग डुबकी लगाते, बिछड़ते और उसी घाट पर मिलते भी रहे। मकर संक्रांति के स्नान के साथ ही अन्न, वस्त्र और खिचड़ी का भी दान संतों-भक्तों ने खूब किया। संगम के साथ ही पांच सेक्टर में बसे माघ मेले में छह घाटों पर स्नान का उत्सव छाया रहा। ओल्डजीटी, गंगोली शिवाला के अलावा त्रिवेणी मार्ग से लगे रामघाट पर भी संगम के रूप में पुण्य की डुबकी लगाई गई।
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prayagraj news : मकर संक्रांति पर प्रयागराज माघ मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़।
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संगम पर कोविड प्रोटोकॉल में लगी पुण्य की डुबकी
कोविड प्रोटोकॉल के बीच बृहस्पतिवार को प्रथम स्नान पर्व की डुबकी लगाई गई। इसके लिए हर सेक्टर में बने कोविड-जांच केंद्रों पर श्रद्धालुओं की जांच कराई जाती रही। स्वास्थ्य कर्मियों की सर्वे टीम ने दिन भर सेक्टरवाइज अभियान चलाया। लाउडस्पीकर से लोगों मास्क लगाकर मेले में चलने और लगातार हाथ सैनिटाइज करने के लिए प्रेरित किया जाता रहा। शिविरों में संतों-कल्पवासियों को कोरोना निगेटिव का प्रमाण पत्र भी दिया जाता रहा।