कुंभ में आए संतों के श्रृंगार से श्रद्धालु अभिभूत हैं। मन में श्रद्धा का भाव लिए संत अपने श्रृंगार को लेकर भी काफी सजग हैं। इसमें सबसे ज्यादा श्रृंगारिक संत किन्नर अखाड़े में देखे जा सकते हैं। गहनों से लकदक, चेहरे पर मुस्कान लिए इन संतों को देखने के लिए सुबह से शाम तक श्रद्धालुुओं का तांता लगा हुआ है।
किन्नर अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी रुद्धाक्ष के मनकों के ऊपर सोने की परत चढ़ी माला और सोने के हार के साथ हंसुली भी धारण करते हैं। इसके साथ हाथ में सोने और हीरे के कई कड़े भी उनके श्रृंगार का हिस्सा हैं। अकेले लक्ष्मीनारायण ही नहीं उनके शिविर में रहने वाले सभी किन्नर संतों का श्रृंगार निराला है।
शंकराचार्य सुमेरूपीठाधीश्वर स्वामी नरेंद्रानंद्र सरस्वती अपना श्रृंगार स्फटिक की मालाओं से करते हैं। उनका कहना है कि स्पटिक एक ऐसी धातु हैं, जिसमें किसी भी देवी, देवता का मंत्र जपा जा सकता है। यह ऐश्वर्य, वैभव का प्रतीक भी है। इसका वैज्ञानिक पक्ष भी है। यह शीतलता और ऊर्जा देता है।
इसी तरह रामानुजाचार्य हंसदेवाचार्य तुलसी के मनके और स्पटिक की मालाओं से अपना श्रुंगार करते हैं। उनका कहना है कि तुलसी देवत्व का प्रतीक मानी जाती है। जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद का श्रृंगार उनके माथे के तिलक के साथ गले में सोने की छोटी-छोटी पत्तियों के बीच रुद्धाक्ष के मनके बहुत ही खूबसूरत लगते हैं।
समाधि तक जाने का माध्यम है श्रृंगार
शास्त्रों में श्रृुंगार को सर्वोंत्तम माना गया है। भगवान राम, श्रीकृष्ण, आदिदेव शंकर का श्रृंगार पक्ष काफी वैभवशाली है। शंकराचार्य नरेंद्रनंद्र सरस्वती ने बताया कि श्रंगार का पक्ष सकारात्मक और भावपूर्ण होता है।