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अखाड़ों में महिलाओं ने तोड़ा नागाओं का वर्चस्व, विदेशियों में भी दिखा संन्यास के प्रति आकर्षण

Sat, 09 Feb 2019 03:16 AM IST
देव कश्यप अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज
अनूप ओझा, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: देव कश्यप Updated Sat, 09 Feb 2019 03:16 AM IST
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Sadhvis predominance on naga sadhu in akharas in Kumbh mela prayagraj
Female Naga Sadhu - फोटो : Social Media

इसे सांसारिक मायामोह से विरक्ति कहें या फिर ईश्वर के प्रति बढ़ता अनुराग। आधुनिकता के इस दौर में घर-परिवार का परित्याग कर महिलाओं में संन्यास लेने का चलन बढ़ा है। वह अखाड़ों में पुरुष संन्यासियों का वर्चस्व तोडऩे लगी हैं। पिछले उज्जैन कुंभ की तुलना में इस कुंभ में अधिक महिलाओं ने भक्ति,समर्पण और वैराग्य को अपना कर संन्यास ग्रहण किया है। संगम तट पर इस दिव्य और भव्य कुंभ में अब तक 250 से अधिक महिलाएं संन्यास की दीक्षा ले चुकी हैं। इसमें पड़ोसी देश नेपाल से लेकर रूस, इटली, स्विटजरलैंड और हंगरी तक की कई विदेशी महिलाएं भी शामिल हैं। अब यह साध्वियां अपने-अपने गुरुओं के आश्रमों, मठों के अलावा परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम करेंगी।

Sadhvis predominance on naga sadhu in akharas in Kumbh mela prayagraj
Female naga
जूना अखाड़े में बुधवार को नेपाल की परित्यक्तता महिलाओं के अलावा परिवार से बिछड़कर बेसहारा जीवन जी रहीं कई महिलाओं ने संन्यास ले लिया। इनके साथ ही कुछ पढ़ी लिखी, आधुनिक जीवन शैली को अपनाने वाली विदेशी महिलाओं ने भी संन्यास की दीक्षा ली। इटली की टारा पिछले कई वर्षों से काशी में वेद अध्ययन कर रही हैं। उन्होंने जूना अखाड़े की 13 मढ़ी की महंत मीरा पुरी को गुरु बना लिया।
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Female naga

वह पिछले एक वर्ष से महंत मीरा पुरी के लगातार संपर्क में बनी हुई थीं। उन्होंने कुंभ में अखाड़े की परंपरा के अनुसार कर्मकांड कर संन्यास ग्रहण किया। संगम की रेती पर मुंडन के बाद उनका पंच गुरु संस्कार विधि विधान से किया गया।अब वह सनातनी संस्कृति और धर्म का प्रचार करेंगी। टारा का नया नाम रम्या गिरि रखा गया है। रम्या कहती हैं कि अब वह हिंदू हैं और भारत की हो गई हैं। भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता ने उनको इस तरह प्रभावित किया कि वह गेरुआ वस्त्र धारण कर संन्यासिनी बन गईं।

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Female Naga - फोटो : Social Media

पिछले दिनों हंगरी की डॉक्टर अनिको ने भी इसी तरह कुंभ में आने के बाद ईश्वर के प्रति लगन लगा बैठीं। अनिको ने चकाचौंध भरी दुनिया का परित्याग कर जूना अखाड़े की महिला महामंडलेश्वर साध्वी हेमानंद गिरि से संन्यास की दीक्षा ली। अब वह हंगरी में आश्रम बनाकर सनातनी संस्कृति के लिए काम करेंगी। इसी तरह रचना, शशिप्रभा सिंह, पार्वती, सुलोचना समेत सौ से अधिक महिलाओं ने भी एक साथ गुरुओं की शरण में समर्पित हो गईं और संन्यास धारण कर लिया।

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Female naga

पंच गुरु मिलकर बनाते हैं एक संन्यासिनी 
महिलाओं के सन्यास की प्रक्रिया में पांच गुरु शामिल होते हैं। इनमें चोटी गुरु, लंटोगी गुरु, भगवा गुरु, भभूति गुरु और कंठी गुरु के नाम शामिल हैं। 

अखिल भारतीय जूना संन्यासिनी राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत आराधना गिरि ने कहा कि अखाड़ा महिलाओं के संन्यास की परंपरा भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठतम परंपरा है। इसमें पहले वैरागी जीवन जीना पड़ता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वर्ष भर समर्पण और भक्ति की परीक्षा देनी पड़ती है। फिर गुरु मुहूर्त निकलवाते हैं और शिष्या बनाते हैं, लेकिन संन्यास संस्कार होता है गंगा के तट पर कुंभ में। 

जूना अखाड़ा महंत मीरा पुरी ने कहा कि पहले अखाड़ों में नागा बनने और संन्यास लेने में पुरुषों का ही एकाधिकार और वर्चस्व था, लेकिन अब यह टूट रहा है। अखाड़ों में महिलाओं के लिए भी संन्यास के द्वार खुल गए हैं। महिलाएं घरेलू हिंसा, तिरस्कार, अपमानजनक बातों और उत्पीडऩ, दबाव से ऊब कर ईश्वर की शरण में भजन के साथ सद्गति के लिए आ रही हैं। इस कुंभ में महिलाओं के संन्यास लेने की परंपरा मजबूत हुई है।

जूना अखाड़ा महंत लक्ष्मी सरस्वती ने कहा कि सटीक आंकड़ा तो मैं नहीं दे सकती, लेकिन इतना जरूर है कि पिछले कुंछ की तुलना में इस कुंभ में महिला संन्यासिनियों की संख्या बढ़ी है। यह जूना अखाड़े के साथ ही सनातनी संस्कृति के लिए शुभ संकेत है।


 
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