प्रयागराज कुंभपर्व में बुधवार को फिर पंचदशनाम जूना अखाड़े की ओर से तकरीबन सौ साध्वियों और नौ सौ अवधूतों सहित एक हजार को संन्यास की दीक्षा दी गई। इससे पहले जूना की ओर से तकरीबन दो हजार अवधूतों और डेढ़ हजार साध्वियों को संन्यास दीक्षा दी जा चुकी है। मौनी अमावस्या के दूसरे शाही स्नानपर्व के बाद बुधवार को जूना अखाड़े की ओर से अवधूतों को नागा सन्यासी बनाने के क्रम में गंगा किनारे संस्कारित किया गया। खुद के लिए सत्रहवां पिंडदान करके अवधूत संन्यासी बन गए।
धर्मदंड लिए अखाड़े के कोतवालों की देखरेख में गंगा किनारे आरंभ दीक्षा संस्कार के तहत गंगा स्नान, भस्म स्नान, गोमूूत्र, गाय के गोबर, पंचगव्य, पंचामृत स्नान, गंगा स्नान के बाद नई लंगोटी दी गई। परंपरानुसार यज्ञोपवीत के बाद उन्हें पलाश का दंड और कुल्हड़ का कमंडल प्रदान किया गया।
काशी के पुरोहितों डॉ.रविशंकर तिवारी, आचार्य जितेंद्र मणि त्रिपाठी, आचार्य संतोष जी, आचार्य बचऊजी और उज्जैन के आचार्य संजय बधेका के आचार्यत्व में सभी ने स्वयं के लिए सत्रहवां पिंडदान किया। बाद में सभी पिंडों को गंगा में विसर्जित किया गया। आधी रात के बाद विजयाहवन संस्कार सहित पूरी रात ओम नम:शिवाय का जाप जारी रहा। गंगा किनारे हुए अनुष्ठान में अनेक संत, संन्यासी, कोतवाल मौजूद थे।
सौ बनीं संन्यासिनी
पंचदशनाम जूना अखाड़े की ओर से संन्यास दीक्षा के क्रम में तकरीबन सौ साध्वियों को भी बुधवार को गंगा किनारे संन्यासिनी बनाया गया। परंपरा के मुताबिक जुटीं साध्वियों ने भी स्वयं के लिए सत्रहवां पिंडदान किया। दीक्षा संस्कार के बाद सभी दशनामी संन्यासिनी महिला अखाड़े की सदस्य बन गईं। दीक्षा के दौरान अखाड़े के कोतवालों ने किसी अन्य को वहां पर प्रवेश नहीं करने दिया।
खास-खास
- नागा संन्यासियों के शरीर पर लगाने के लिए बाबा विश्वनाथ मंदिर की भभूत और दंड बनाने के लिए पलाश सहित अन्य पूजा सामग्री काशी से लाई गई
- नागा बनाने के लिए किसी भी तरह के जाति बंधन से सभी मुक्त रखा गया। संन्यासियों में मुस्लिम और ईसाई छोड़कर सभी जातियों के साधु शामिल थे।