कुंभ की धरती पर आकर अपनों के साथ अपने पूवर्जों को याद करने की परंपरा भी है। इसका सबसे बड़ा माध्यम सूर्य को अर्घ्य देना है।
सूर्य को अर्घ्य देने से आत्मिक सुख तो मिलता ही है, इसका वैज्ञानिक पक्ष यह है कि इससे चर्म रोग दूर होता है, हाई ब्लड प्रेशर सामान्य हो जाता है। किसी को लो ब्लड प्रेशर है तो उससे भी राहत मिलती है।
देवराहा बाबा सेवाश्रम ट्रस्ट के प्रमुख डा. रामेश्वर प्रपन्नाचार्य बताते हैं कि अघ्र्य हमेशा ताबे के बर्तन से दिया जाता है। इसमें गंगाजल या सामान्य जल के साथ उसमें लाल रंग का पुष्प जिसमें गुलाब, गेंदे का फूल, गुड़हल या फिर कोई और पुष्प के साथ रोली और अक्षत डालकर अर्घ्य दिया जाता है।
डा. प्रपन्नाचार्य ने बताया कि अर्घ्य देने का विधान यह है कि मस्तक से छह अंगुल ऊपर से दोनों हाथ उठाकर सूर्य की दिशा में जल छोड़ना चाहिए। यदि सूर्य का उदय हो गया है तो सूर्य को पात्र से गिर रहे जल के बीच से देखना चाहिए।
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सूर्य को अर्घ्य देते श्री विद्यामठ के बटुक
इसके अलावा अंजुली से भी अर्घ्य देने की परंपरा है। वैसे अंजुली से अर्घ्य देने को अर्घ्य नहीं सूर्य तर्पण कहा जाता है। इससे भी सूर्य की किरणों से शरीर को ऊर्जा मिलती है। जिससे बीमारियां ठीक होती है।