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आगरा की 'नून की मंडी' में आज 'चमक' रहे हैं हीरे-जवाहरात, मुगलकालीन है इसका इतिहास
Tue, 15 Dec 2020 12:06 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Tue, 15 Dec 2020 12:06 AM IST
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नमक की मंडी
- फोटो : अमर उजाला
मुगलकाल में बनी आगरा की मंडियों में से एक नून की मंडी (नमक की मंडी) की पहचान पूरी तरह बदल चुकी है। मुगलकाल में नमक के व्यापार के लिए भी अलग से मंडी बनाई गई थी। नाम पड़ा नमक की मंडी लेकिन आज यहां नमक का नहीं, सोने-चांदी और हीरे-जवारहात का व्यवसाय होता है। यह मंडी स्वतंत्रता संग्राम की भी गवाह रही है।
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बादशाह अकबर के दौरान में आगरा किला के पास ही यह मंडी बनाई गई। इसे आम बोलचाल में नून की मंडी कहा जाता था। नमक का थोक और फुटकर दोनों तरह का व्यापार था।
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मुगल दौर तक यहां नमक का कारोबार ही हुआ लेकिन बाद में अन्य दुकानें खुलीं तो स्वरूप बदलता चला गया। इतिहास की किताबों में इस मंडी का जिक्र मिलता है। अंग्रेजों के समय में यह सिर्फ नाम की नमक की मंडी रह गई। अन्य व्यापार जोर पकड़ गए।
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यहां खारे पानी से बनाया गया था नमक
नमक की मंडी स्वतंत्रता संग्राम की गवाह रही है। महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के दौरान इस मंडी में खारे पानी से नमक बनाकर फिरंगियों का विरोध किया गया था।
नमक की मंडी में गांधीजी के चरखा संघ की भी स्थापना हुई थी। इसके अध्यक्ष निरंजन सिंह, कोषाध्यक्ष लक्ष्मण प्रसाद थे। व्यवस्था श्याम लाल रेशम वाले संभालते थे। यहां कांग्रेस का दफ्तर भी खुला था। इसी मंडी में राय बहादुर घनश्याम दास की हवेली थी। उसमें क्रांतिकारी छिपते थे और रणनीति बनाते थे।
नमक की मंडी स्वतंत्रता संग्राम की गवाह रही है। महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह के दौरान इस मंडी में खारे पानी से नमक बनाकर फिरंगियों का विरोध किया गया था।
नमक की मंडी में गांधीजी के चरखा संघ की भी स्थापना हुई थी। इसके अध्यक्ष निरंजन सिंह, कोषाध्यक्ष लक्ष्मण प्रसाद थे। व्यवस्था श्याम लाल रेशम वाले संभालते थे। यहां कांग्रेस का दफ्तर भी खुला था। इसी मंडी में राय बहादुर घनश्याम दास की हवेली थी। उसमें क्रांतिकारी छिपते थे और रणनीति बनाते थे।