दिल्ली एनसीआर में दिवाली के बाद प्रदूषण का स्तर काफी बढ़ा हुआ है। बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए 28 अक्तूबर को दिल्ली में कृत्रिम बारिश की पहली टेस्टिंग की गई। कई बार सरकारें और वैज्ञानिक क्लाउडिंग सीडिंग के जरिए कृत्रिम बारिश कराकर प्रदूषण के स्तर को कम करने को लेकर चर्चा करती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो दिल्ली में प्रदूषण के स्तर को क्लाउड सीडिंग की मदद से कुछ समय के लिए कम किया जा सकता है।
Cloud Seeding: क्या होती है क्लाउड सीडिंग? जानिए कैसे कृत्रिम ढंग से कराई जाती है बारिश
क्लाउड सीडिंग भी तभी सफल होती है जब वातावरण में पर्याप्त बादल मौजूद होते हैं और उनमें नमी होती है। आइए जानते हैं क्या होती है क्लाउड सीडिंग और कैसे कृत्रिम ढंग से बारिश कराई जाती है?
क्या है क्लाउड सीडिंग?
क्लाउड सीडिंग एक खास तरह की तकनीक है, जिसमें वैज्ञानिक बादलों में रासायनिक तत्वों को छोड़ते हैं, ताकि बारिश को कराया जा सके। क्लाउड सीडिंग के जरिए उन इलाकों में बारिश कराई जाती है, जहां या तो सूखा होता है या बारिश कम होती है।
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क्लाउड सीडिंग कराए जाने का मुख्य उद्देश्य हवा को साफ करना, सूखा कम करना, बारिश की मात्रा को बढ़ाने के साथ साथ पानी की कमी को दूर करना है। वहीं दिल्ली में प्रदूषण के बढ़े हुए स्तर को कम करने के लिए क्लाउड सीडिंग की जा रही है।
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कैसे होती है क्लाउड सीडिंग?
क्लाउड सीडिंग कराने से पहले वैज्ञानिक यह पता करते हैं कि कौन सा बादल बारिश कराने के लिए उपयुक्त है। वे बादल जिनमें नमी अधिक होती है और तापमान माइनस या जीरो डिग्री के आसपास होता है वे क्लाउड सीडिंग के लिए उपयुक्त होते हैं।
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बादल की पहचान करने के बाद विमान की मदद से उन पर रासायनिक पदार्थ का छिड़काव किया जाता है। ये रासायनिक पदार्थ बादल में पानी की बूंदों के बनने की प्रक्रिया को तेज कर देते हैं। इसके बाद बूंदें बड़ी होने लगती हैं और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव की वजह से नीचे गिरने लगती हैं। क्लाउड सीडिंग कराने के लिए सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम आयोडाइड जैसे रासायनिक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है।
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