ज्योतिष शास्त्र के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद महीने की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को वृष लग्न में मथुरा में हुआ था। आइए, जानते हैं कान्हा की प्रचलित जन्म कुंडली के आधार पर क्या कहते हैं मुरली मनोहर के सितारे —
लग्न में चंद्रमा होने के कारण भगवान कृष्ण आकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी थे। चंद्रमा से शुक्र केंद्र में है और सूर्य चतुर्थ भाव से स्वराशि में स्थित है। कान्हा की कुंडली में पांच ग्रह उच्च के तथा एक ग्रह स्वराशि का है। यही कारण है कि भगवान श्री कृष्ण 16 कलाओं से परिपूर्ण थे।
शुक्र के चतुर्थ भाव में स्थित होने से इनको उच्च स्तर का वैभवपूर्ण जीवन मिला। मित्रों का भरपूर साथ मिला। कान्हा की कुंडली में गजकेसरी योग भी है। लग्न में उच्च का चंद्रमा इनको अपने भक्तों के लिए भावुकता देता है और तृतीय भाव जो कि शिष्यों, अनुयायियों का भाव भी है। यही कारण है कि पूरा विश्व कृष्ण को अपना गुरु मानता है।
एकादशेश तृतीय भाव में स्थित होने से जातक अपने भाई बहनों में सबसे छोटा होता है जो कि कुंडली से भी स्पष्ट होता है। तृतीय भाव पर मंगल और शनि की दृष्टि होने से इनका कोई भी भाई बहन जीवित नहीं बच सका। द्वितीयेश बुध के पंचम भाव में उच्च राशि में स्थित होने से श्री कृष्ण विलक्षण बुद्धि के स्वामी और कला प्रेमी थी।
भाग्येश और दशमेश जो कि शनि है, रिपु भाव में स्थित होने के कारण वे राक्षसों का वध करते हैं। कृष्ण ने शिशुपाल, दंतवक्र, कंस आदि तमाम राक्षसों का वध किया था। शनि और राहु के छठे भाव में स्थित होने से माखन-चोर कहलाए। दशमेश छठे भाव में चंद्र और शुक्र दोनों केंद्र में है। जिससे इनकी मोहिनी त्रिभंगी मुद्रा के दर्शन होते हैं।