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Kalashtami 2025: कालाष्टमी पर करें इस कथा का पाठ, मिलेगा काल भैरव का आशीर्वाद

Tue, 21 Jan 2025 08:07 AM IST
ज्योति मेहरा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: ज्योति मेहरा Updated Tue, 21 Jan 2025 08:07 AM IST
सार

कालाष्टमी के दिन विधिवत काल भैरव की पूजा और कालाष्टमी व्रत कथा का पाठ करने से मनुष्य के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। काल भैरव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। काल भैरव की कृपा से जीवन में सफलता भी मिलती है। 

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Kalashtami 2025 Kalashtami vrat katha in hindi Kaal Bhairav Ki Janm Katha
कालाष्टमी व्रत कथा - फोटो : Amar Ujala

Kalashtami Puja 2025: हिन्दू धर्म में कालाष्टमी का बहुत महत्व है। इस दिन को भगवान काल भैरव की पूजा करने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा मान्यता है कि काल भैरव की पूजा करने से बुरी शक्तियों का नाश होता है और जीवन में सकारात्मकता का वास होता है। काल भैरव अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। उनकी पूजा-अर्चना करने से जातक को तमाम बुरे प्रभावों से सुरक्षा प्राप्त होती है। काल भैरव की कृपा से जीवन में सफलता भी मिलती है। 



कालाष्टमी व्रत कब रखा जएगा?
पंचांग के अनुसार कालाष्टमी का व्रत माघ माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस साल यह तिथि 21 जनवरी को दोपहर में 12:39 बजे से शुरू होगी और 22 जनवरी को दोपहर में 03:18 बजे खत्म होगी। ऐसे में माघ माह की कालाष्टमी 21 जनवरी को मनाई जाएगी। क्योंकि कालाष्टमी की पूजा शाम के समय ही की जाती है। इस दिन विधिवत काल भैरव की पूजा और कालाष्टमी व्रत कथा का पाठ करने से मनुष्य के सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। कालाष्टमी व्रत कथा कुछ इस प्रकार है...

Kalashtami 2025: इस दिन रखा जाएगा मासिक कालाष्टमी व्रत, जानें शुभ योग, पूजा मुहूर्त और महत्व

Kalashtami 2025 Kalashtami vrat katha in hindi Kaal Bhairav Ki Janm Katha
कालाष्टमी व्रत कथा - फोटो : amar ujala
कालाष्टमी व्रत कथा
शिवपुराण के अनुसार कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कालभैरव का जन्म हुआ था। ऐसी मान्यता है कि काल भैरव के व्रत का पालन करने से भक्तों की समस्त इच्छाएं पूरी हो जाती हैं और तंत्र-मंत्र या जादू-टोने से जुड़ी हर प्रकार की बाधा समाप्त हो जाती है। ज्योतिषीय दृष्टि से, काल भैरव की पूजा करने से नवग्रहों के अशुभ प्रभाव खत्म हो जाते हैं, जिससे व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है।

 
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त्रिदेवों के बीच विवाद और काल भैरव की उत्पत्ति - फोटो : freepik
त्रिदेवों के बीच विवाद और काल भैरव की उत्पत्ति
प्राचीन काल की एक कथा के अनुसार, भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बीच यह प्रश्न उठा कि उनमें से सबसे श्रेष्ठ कौन है। इस विवाद को सुलझाने के लिए सभी देवी-देवताओं की सभा का आयोजन हुआ। गहन विचार-विमर्श के बाद भगवान शिव और विष्णु ने सभा के निर्णय को स्वीकार कर लिया, लेकिन ब्रह्मा जी असंतुष्ट रहे। उन्होंने भगवान शिव का अपमान करने का प्रयास किया, जिससे शिव अत्यधिक क्रोधित हो गए।

 
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कालाष्टमी व्रत कथा - फोटो : freepik
ऐसे में भगवान शिव ने अपने रौद्र रूप में काल भैरव को प्रकट किया। काल भैरव काले कुत्ते पर सवार होकर हाथ में दंड लिए प्रकट हुए थे। उन्होंने क्रोध में ब्रह्मा जी पर प्रहार कर उनके एक सिर को अलग कर दिया। इस घटना के बाद ब्रह्मा जी ने क्षमा याचना की, जिससे शिव का क्रोध शांत हुआ।

 
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वाराणसी और काल भैरव का महत्व - फोटो : freepik
वाराणसी और काल भैरव का महत्व
इस घटना के बाद काल भैरव को ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए विभिन्न स्थानों पर भटकना पड़ा। जब वे वाराणसी पहुंचे तब उन्हें अपने पापों से मुक्ति मिली। काल भैरव को "महाकालेश्वर" और "डंडाधिपति" के नाम से भी जाना जाता है। वाराणसी में उन्हें "दंडपानी" कहा जाता है क्योंकि यहां उन्हें दंड (पाप) से मुक्ति मिली थी।
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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