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इस देवी के मंदिर में मिलता है मन वांछित फल, इंदिरा गांधी समेत ये नामी हस्तियां भी आ चुकी हैं यहां

Sat, 21 Dec 2019 02:14 PM IST
अरविन्द ठाकुर सतीश डढवाल, अमर उजाला, देहरागोपीपुर (कांगड़ा)
सतीश डढवाल, अमर उजाला, देहरागोपीपुर (कांगड़ा) Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Sat, 21 Dec 2019 02:14 PM IST
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Story of Devi Baglamukhi Temple in Kangra in Himachal Pradesh
- फोटो : अमर उजाला

सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का ग्रंथ जब एक राक्षस ने चुरा लिया और पाताल में छिप गया तब उसके वध के लिए मां बगलामुखी की उत्पत्ति हुई। पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान मां का मंदिर बनाया और पूजा अर्चना की। पहले रावण और उसके बाद लंका पर जीत के लिए श्रीराम ने शत्रुनाशिनी मां बगला की पूजा की और वियज पाई। मां को पीतांबरी भी कहा जाता है। इस कारण मां के वस्त्र, प्रसाद, मौली और आसन से लेकर हर कुछ पीला ही होता है। युद्ध हो या राजनीति या फिर कोर्ट-कचहरी के विवाद, मां के मंदिर में यज्ञ कर हर कोई मन वांछित फल पाता है।

Story of Devi Baglamukhi Temple in Kangra in Himachal Pradesh
- फोटो : अमर उजाला

हिंदू पौराणिक कथाओं में मां बगलामुखी को दस महाविद्याओं में आठवां स्थान प्राप्त है। मां की उत्पत्ति ब्रह्मा द्वारा आराधना करने की बाद हुई थी। मान्यता है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का ग्रंथ एक राक्षस ने चुरा लिया और पाताल में छिप गया। उसे वरदान प्राप्त था कि पानी में मानव और देवता उसे नहीं मार सकते। ऐसे में ब्रह्मा ने मां भगवती का जाप किया। इससे बगलामुखी की उत्पत्ति हुई। मां ने बगुला का रूप धारण कर उस राक्षस का वध किया और बह्मा को उनका ग्रंथ लौटाया।

Story of Devi Baglamukhi Temple in Kangra in Himachal Pradesh
- फोटो : अमर उजाला

त्रेतायुग में मां बगलामुखी को रावण की ईष्ट देवी के रूप में भी पूजा जाता था। रावण ने शत्रुओं का नाश कर विजय प्राप्त करने के लिए मां की पूजा की। लंका विजय के दौरान जब इस बात का पता भगवान श्रीराम को लगा तो उन्होंने भी मां बगलामुखी की आराधना की थी। बगलामुखी का यह मंदिर महाभारत काल का माना जाता है। इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग में पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान एक ही रात में की थी।

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Story of Devi Baglamukhi Temple in Kangra in Himachal Pradesh
- फोटो : अमर उजाला

यहां सर्वप्रथम अर्जुन एवं भीम ने युद्ध में शक्तियां प्राप्त करने और मां बगलामुखी की कृपा पाने के लिए विशेष पूजा की थी। मां बगलामुखी का मंदिर जिला कांगड़ा के बनखंडी गांव में है। पुजारी सचिन शर्मा बताते हैं कि मंदिर के साथ प्राचीन शिवालय में आदमकद शिवलिंग स्थापित है, जहां लोग माता के दर्शन के उपरांत जलाभिषेक करते हैं। यह मंदिर लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। पांडुलिपियों में मां के जिस स्वरूप का वर्णन है, मां उसी स्वरूप में यहां विराजमान हैं। मंदिर के पुजारी ने बताया कि मां हल्दी रंग के जल से प्रकट हुईं थीं। पीले रंग के कारण मां को पीतांबरी देवी भी कहते हैं। इन्हें पीला रंग अति प्रिय है, इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग ही होता है। देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है।

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Story of Devi Baglamukhi Temple in Kangra in Himachal Pradesh
- फोटो : अमर उजाला

साधक को मां बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करने चाहिए। मंदिर की हर चीज पीले रंग की है। यहां तक कि वस्त्र, प्रसाद, मौली, मंदिर का रंग भी पीला है। इनके कई स्वरूप हैं। इस महाविद्या की उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि प्राप्त होती है। इनके भैरव महाकाल हैं। मां बगलामुखी भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनकी बुरी शक्तियों का नाश करती हैं। पूजा और हवन का महत्व- देवी बगलामुखी में संपूर्ण ब्रह्मांड की शक्ति का समावेश है। शत्रुनाशिनी देवी मां बगलामुखी मंदिर में मुकदमों में फंसे लोग, पारिवारिक कलह व जमीनी विवाद को सुलझाने के लिए, वाकसिद्धि, वाद-विवाद में विजय, नवग्रह शांति, ऋद्धि-सिद्धि प्राप्ति और सर्व कष्टों के निवारण के लिए शत्रुनाश हवन करवाते हैं। इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है।

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