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नवरात्र विशेषः एक ऐसी शक्तिपीठ जहां गिरी थी माता सती की आखें, कीजिए दर्शन और पाइए मां की असीम कृपा

Fri, 22 Sep 2017 09:59 AM IST
amarujala.com- Presented by : अशोक चौहान
amarujala.com- Presented by : अशोक चौहान Updated Fri, 22 Sep 2017 09:59 AM IST
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Shardiya Navratri history and mythological stories about naina devi Temple

आज यान‌ि 21 सितंबर से शरद नवरात्रों का आगाज हो गया है। इसको देखते हुए देवभूमि हिमाचल के शक्तिपीठों को भव्य तरीके से सजाया गया है। आज हम आपको बता रहे हैं एक ऐसी शक्तिपीठ के बारे में, जहां लाखों भक्‍त हर वर्ष माता के दर्शनों के लिए आते हैं। हम बात कर रहे है श्री नयना देवी माता मंदिर की, जो हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिला में स्थित है। समुद्र तल से मंदिर की ऊंचाई 1177 मीटर है। इस भव्य मंदिर की स्थापना को लेकर कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं। कीजिए दर्शन और पाइए मां की असीम कृपा। 

Shardiya Navratri history and mythological stories about naina devi Temple

एक पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान शिव माता सती के मृत शरीर को अपने कंधों पर उठाकर तांडव नृत्य कर रहे थे तो सभी देवता भयभीत हो गए। तब देवताओं के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को 51 टुकड़ों में काट दिया। जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, उन स्‍थानों को बाद में पवित्र शक्तिपीठों के नाम पर पूजा जाने लगा। श्री नयना देवी मंदिर एक ऐसी जगह है जहां माता सती की आंखें गिर गईं।

Shardiya Navratri history and mythological stories about naina devi Temple

मंदिर से संबंधित एक और कहानी नयना नाम गुज्जर लड़के का है। एक बार वह अपने मवेशियों चरा रहा था तो देखा कि एक सफेद गाय एक पत्थर पर दूध दे रही है। ऐसा कई दिनों तक होता रहा। इसके बाद एक रात उसे सपने में देवी ने दर्शन ‌‌दिए। माता ने उसे बताया कि पत्थर उसकी पिंडी है। इसके बाद स्‍थानीय राजा ने यहां नयना माता के नाम से एक मंदिर बनाया।

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नयना देवी मंदिर को महिषापीठ के नाम से भी जाना जाता है। किंवदंतियों के अनुसार महिषासुर एक शक्तिशाली राक्षस था, जिसे भगवान ब्रह्मा से अमर होने का वरदान प्राप्त था। इस वरदान के अनुसार केवल एक अविवाहित महिला ही महिषासुर को मार सकती थीं। इस वरदान के कारण महिषासुर ने धरती और देवताओं पर आतंक फैलाना शुरू कर दिया। दानव से निपटने के लिए सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां एकत्रित की और उसे  पराजित करने के लिए एक देवी बनाई। देवी को सभी देवताओं द्वारा विभिन्न प्रकार के हथियार भेंट किए गए।  महिषासुर देवी की सुंदरता से मंत्रमुग्ध हो गया और शादी का प्रस्ताव रखा। इस पर देवी ने शर्त रखी की अगर वह उसे युद्घ में हरा देगा तो वह उससे शादी करेंगी। लड़ाई के दौरान देवी ने राक्षस को मार गिराया और उसकी दोनों आंखे निकाल दी। इस पर देवताओं ने देवी की सराहना करते हुए "जय नयना" का उद्घोष किया। फिर इसी नाम से मंदिर को जाना जाने लगा।

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एक और कहानी सिख गुरु गोबिंद सिंह जी के साथ जुड़ी हुई है। जब गुरु गोबिंद सिंह 1756 में मुगलों के खिलाफ अपने सैन्य अभियान के लिए रवाना हुए, तो वे श्री नयना देवी चले गए और देवी का आशीर्वाद पाने के लिए एक बलिदान यज्ञ किया। आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद उन्होंने सफलतापूर्वक मुगलों को हराया।

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