शिमला से 400 किलोमीटर ऊपर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में हो रहे शोध का खुलासा हो गया है। यदि ये शोध कामयाब रहा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए वरदान साबित होगा। आइए जानते हैं आखिर ऐसा क्या हो रहा है-
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में कटे अंगों और टूटी हड्डियों को तेजी से जोड़ने पर वैज्ञानिक शोध हो रहा है। ये शोध सैनिकों और आम लोगों के कटे अंगों को जोड़ने की चिकित्सा पद्धति के लिए कारगर होगा। कुछ दिन पहले अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) शिमला के आसमान में चक्कर काटते नजर आया था मगर अब यह गायब हो गया है।
अंतरिक्ष यात्रियों में महिला अंतरिक्ष यात्री पेगी व्हिटसन बायो केमिस्ट्री की वैज्ञानिक हैं। इनमें बाकी पांच अंतरिक्ष यात्रा के विशेषज्ञ हैं। ये शोध कर रहे हैं कि लाइटिंग स्वास्थ्य को कैसे बदल सकती है। ये इस स्पेस स्टेशन में रहने वाले क्रू सदस्यों को कैसे ठीक-ठाक रख सकती है।
यह भी शोध चल रहा है कि कैसे माइक्रो ग्रेविटी अंतरिक्ष में उगाए गए पौधों में जेनेटिक बदलाव ला सकती है। माइक्रो ग्रेविटी कैसे मानव शरीर के उत्तकों के पुनर्निर्माण को प्रभावित करती है। स्पेस में जिस तरह से ग्रेविटी घटी होती है, उसमें मानव शरीर के टिशू का तेजी से पुनर्निर्माण होता है।
ये शोध उन सैनिकों और आम लोगों के लिए लाभदायी हो सकता है जिनके अंग कट जाते हैं। विभिन्न अंगों सहित टूटी हड्डियों के तेजी से जोड़ने पर भी बोन मेरो पर अनुसंधान चल रहा है।