ब्रिटिश शासन की बेड़ियों से भारत को स्वतंत्र करवाने के लिए असंख्य युवाओं ने स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। शहीद भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, खुदीराम बोस जैसे युवा देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वोच्च बलिदान दे गए। ऐसे ही हिमाचल प्रदेश से एक वीर सपूत राम वजीर राम सिंह पठानिया हुए हैं, जिन्होंने 21 साल की छोटी सी उम्र में ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजा दिया था। महज 24 वर्ष की उम्र में भारत माता के लिए स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में प्राणों की आहुति देकर अमर हो गए।
आजादी का अमृत महोत्सव: राम सिंह पठानिया से प्रेरणा लेकर आज भी सेना को पहली पसंद मानते हैं युवा
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प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा, कैप्टन विक्रम बतरा, कैप्टन सौरभ कालिया और ऐसे न जाने कितने हिमाचली वीर सपूत देश की रक्षा के लिए सर्वोच्च बलिदान देकर उसी परंपरा को आगे बढ़ाते रहे हैं, जो कभी वजीर राम सिंह पठानिया ने शुरू की थी।
शोध करवाकर दिलवाया जाए सम्मान
राम सिंह पठानिया की स्मृतियां अब भी पूरे डुग्गर क्षेत्र (जम्मू से लेकर मंडी तक) में रची-बसी हैं, लेकिन उनके साहस और रणनीति का आकलन अभी राष्ट्रीय स्तर पर होना बाकी है। 1857 से पहले 21-22 वर्ष की आयु में अंग्रेजों को व्यवस्थित और रणनीति के साथ एक बड़े क्षेत्र में चुनौती देने वाला कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलता। उनके योगदान पर प्रामाणिक शोध समय की आवश्यकता और राष्ट्रीय कर्तव्य है। -डॉ. जयप्रकाश सिंह, सहायक आचार्य, कश्मीर अध्ययन केंद्र, सीयू।
जब राम सिंह जी लड़ते थे तो तलवार दिखती नहीं थी
नूरपुर के वासा वजीरां में रहने वाले राम सिंह पठानिया के वंशज उदय पठानिया ने बताया कि युद्ध के दौरान वह चंडी तलवार को इतनी तेजी से चलाते थे कि वह दुश्मन को दिखती तक नहीं थी। ऐसा बताया जाता है कि जिन चंडी माता की वह उपासना करते थे, उसकी शक्ति चंडी नाम की उस तलवार में आ जाती थी। - उदय पठानिया, राम सिंह पठानिया के वंशज
राम सिंह के शौर्य से काफी प्रभावित थे विक्रम बतरा: जीएल बतरा
कारगिल युद्ध के दौरान बलिदान देने वाले विक्रम बतरा के पिता जीएल विक्रम बतरा ने बताया कि विक्रम बचपन से ही वीर राम सिंह पठानिया के शौर्य के किस्सों से बेहद प्रभावित थे। उन्होंने बताया कि जब कभी भी संभव होता, तो वह राम सिंह पठानिया के बारे में पढ़ते-सुनते रहते थे। आने वाली पीढ़ियों को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।