राजस्थान विधान सभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। पाली जिले में भी चुनावी हलचलें तेज होती जा रही हैं और भाजपा- कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों से चुनाव लडने के इच्छुक उम्मीदवारों ने टिकट के लिए अपनी दावेदारी जताना शुरू कर दिया है। पहली बार भाजपा में कांग्रेस की तर्ज पर टिकट दावेदारों की लंबी कतार देखने को मिल रही हैं। 1998 से लगातार जीत रहे पारख के सामने इस बार कई चुनौतियां हैं।
साढे तीन दशक से भी अधिक समय से कांग्रेस पाली में सत्ता से बाहर
प्रदेश के औद्योगिक जिलों में शुमार पाली जिले को हाल ही में गहलोत सरकार द्वारा संभाग बनाए जाने का लाभ पाली को कब और कितना मिलेगा ? यह तो समय ही बताएगा, लेकिन अभी सभी की नजर नवंबर 2023 में होने वाले विधानसभा चुनावों पर टिकी है कि सीएम अशोक गहलोत के इस मास्टर स्ट्रोक का लाभ कांग्रेस को मिल पाएगा या फिर साढ़े तीन दशक से भी अधिक समय से सत्ता से बाहर कांग्रेस इस बार भी यहां पर पराजय का मुंह देखेगी और एक बार फिर से भाजपा प्रत्याशी ही पाली का विधानसभा में प्रतिनिधित्व करेगा।
अब तक यह रहा है भाजपा और कांग्रेस का सियासी गणित
आजादी के बाद देश में चली राजनीतिक बदलाव की लहर से पाली जिला भी अछूता नहीं रहा है। लेकिन 1977 की जनता आंधी के चलते भी इस जिले में मजबूती से टिकी रही कांग्रेस अब सत्ता में फिर से आने के लिए हाथ पांव मार रही है। गौरतलब है कि 1977 में भी जिले की 8 विधानसभा में से 4 पर कांग्रेस अपना कब्जा बरकरार रखने में सफल रही थी, लेकिन 1985 के चुनावों में पुष्पा जैन के बल पर भाजपा ने इस जिले में पहली बार 3 विधासभा सीटों पर जीत हासिल कर अपना खाता खोला था। इसके बाद 1990 के विधानसभा चुनावों में कांगेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। जिसके चलते इन चुनावों में कांग्रेस जिले की एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाई। जबकि भाजपा ने पिछले चुनावों की अपेक्षा तरक्की करते हुए जिले की 8 सीटों में से 7 सीटों पर कब्जा किया और शेष एक सीट पर भी भाजपा के बागी उम्मीदवार ने जीत हासिल की।
यहां से बदले समीकरण
वर्ष 1993 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 4 सीटों पर, जबकि कांगेस ने 3 सीटों पर कब्जा किया। वहीं जिला मुख्यालय यानि पाली विधानसभा सीट पर निर्दलीय के रूप में चुनाव लडकर भीमराज भाटी ने जीत हासिल की और विधानसभा में प्रवेश किया। यहीं से कांगेस के बुरे दिन शुरू हो गए, इसके बाद सभी चुनावों में भीमराज भाटी ने निर्दलीय चुनाव लडकर कांग्रेस के वोट काटे और पाली विधानसभा सीट बैठे बिठाए भाजपा की झोली में आती गई और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
गुटबाजी का शिकार हुई कांग्रेस
वर्ष 1985 में जिले में नेतृत्वहीन हुई कांग्रेस इसके बाद क्षेत्र में आज तक एकजुट नहीं हो पाई है और इसी कारण के चलते 1998 में पूरे राज्य में चली कांग्रेस लहर का फायदा भी कांग्रस नहीं ले पाई। जिसके चलते इन चुनावों में कांग्रेस को जिले की 8 सीटों में से मात्र 3 सीटों पर ही जीत हासिल हो पाई। इसमें भी सोजत से जीते माधवसिंह दीवान, सुमेरपुर से जीती बीना काक की जीत में सिंबल की भूमिका कम बल्कि उनके स्वयं के व्यक्तित्व की भूमिका ज्यादा अहम थी। इन चुनावों में एक ओर जहां प्रदेश के कई जिलों में भाजपा का खाता तक नहीं खुला। उस वक्त पाली जिले में भाजपा ने 5 सीटों पर काबिज होकर कांग्रेस को पछाड दिया।
बचाव की स्थिति में है कांग्रेस
इस वर्ष नवम्बर महीने में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में किसके सिर पर विजय का सेहरा बंधेगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। क्योंकि चुनाव परिणामों का अंदाजा तो प्रत्याशियों की घोषणा के बाद ही लगाया जा सकेगा। लेकिन पाली जिले में कांग्रेस की स्थिति कोई खास मजबूत नहीं है। हालांकि इस बार भाजपा में भी पहली बार अंतर्कलह सामने आ सकती है। दूसरी ओर कांग्रेस की आंतरिक फूट का लाभ पाली विधानसभा सीट पर भाजपा को मिलना कोई नई बात नहीं होगी।
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बीजपी लीड़र संजय ओझा,सुनील भंडारी और ज्ञानचंद पारख, बीजेपी विधायक, पाली
- फोटो : अमर उजाला
दोनों दलों के सामने हैं चुनौतियां
कांगेस से टिकट की दावेदारी करने वालों को जब टिकट नहीं मिलेगा, तो वे दावेदार बगावत कर निर्दलीय चुनाव लडकर कांग्रेस प्रत्याशियों की राह को कंटीला बनाने का काम कर सकते हैं। ये स्थितियां कांग्रेस में प्रत्येक विधानसभा चुनावों में रहती हैं, लेकिन इस बार ऐसा पहली बार होगा कि भाजपा में भी टिकट के लिए खींचतान होगी और एक से अधिक दावेदार होने से सिर फुटव्वल की स्थितियां पैदा हो सकती हैं।
पाली चलता है सबसे अलग
गत तीन दशक में पाली विधानसभा में हमेशा विपरीत परिस्थितियां ही रही हैं। जब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनती है , तो भी यहां पर भाजपा ही काबिज होती है। 1993 के चुनावों में जब प्रदेश में भाजपा काबिज हुई तो पाली सीट निर्दलीय प्रत्याशी भीमराज भाटी के खाते में गई और इसके बाद तो राजस्थान में एक बार कांगेस और एक बार भाजपा के काबिज होने का दौर चल रहा है। लेकिन पाली विधानसभा सीट पर तो भाजपा का ही कब्जा होता आया है।
पाली विधानसभा पर काबिज होना कांग्रेस के लिए बडी चुनौती
पाली विधानसभा यानि जिला मुख्यालय पर वर्तमान में भाजपा विधायक ज्ञानचंद पारख काबिज हैं। जिन्होंने 1998 में 41 हजार 682 मत प्राप्त कर कांग्रेस प्रत्याशी केवलचंद गुलेच्छा को तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया था। जबकि दूसरे स्थान पर कांग्रेस के बागी प्रत्याशी और 1993 में निर्दलीय विधायक रहे भीमराज भाटी रहे। पाली विधानसभा से अब तक कुल 17 विधायक चुने गए हैं । जिनमें से 2 निर्दलीय, 1 स्वतंत्र पार्टी, 5 कांग्रेस और 9 बार भाजपा ने जीत हासिल की है। यहां पर वर्ष 1967 से 1980 तक कांग्रेस का कब्जा रहा, लेकिन 1985 और 1990 में यहां से भाजपा प्रत्याशी पहली बार लगातार दो बार विजयी हुई। इसके बाद 1993 में निर्दलीय प्रत्याशी भीमराज भाटी ने जीत हासिल की। वर्ष 1998 में यहां पर यहां से भाजपा प्रत्याशी ज्ञानचंद पारख पहली बार विधायक चुने गए और इसके बाद 2003, 2008, 2013, 2018 में भी लगातार जीत हासिल कर इस विधानसभा में पाली का लगातार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
कांग्रेस में टिकट दावेदारों की लंबी लाइन
वर्तमान में यहां से एक फिर से वही समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं। वर्तमान स्थितियों के अनुसार तो भाजपा से वर्तमान विधायक ज्ञानचंद पारख चुनाव लड़ेंगे। वहीं कांग्रेस की ओर से हमेशा की तरह कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता कांग्रेस से टिकट मांगेगे और इसके लिए सिर फुटव्वल का होना तय है। कांग्रेस से दावेदारों के रूप में पूर्व नगरपरिषद सभापति केवलचंद गुलेच्छा, पूर्व महिला कांग्रेस जिलाध्यक्ष और वर्तमान में राज्य महिला आयोग सदस्य सुमित्रा जैन, पूर्व विधायक भीमराज भाटी, 1998 में कांग्रेस प्रत्याशी रह चुके महावीर सिंह सुकरलाई, पूर्व सभापति प्रदीप हिंगड, नीलम बिडला, सुनीता सुकरलाई सहित पूर्व नगरपरिषद सभापति प्रदीप हिंगड सहित कई अन्य दावेदार शामिल हैं।
भाजपा से पहली मर्तबा दावेदारों की लंबी लाइन
पूर्व सांसद पुष्प जैन, भाजपा के जिला महामंत्री सुनील भंडारी, पूर्व यूआईटी चेयरमैन संजय ओझा, भाजपा के शहर अध्यक्ष और ग्रामीण अध्यक्ष रह चुके पुखराज पटेल, भाजपा ओबीसी मोर्चा के पूर्व जिला उपाध्यक्ष और भाजयुमो के पूर्व जिला संयोजक भंवरनाथ योगी सहित कई और दावेदार टिकट मांगेगे।
फिर भी भाजपा मजबूत स्थिति में
आगामी विधानसभा चुनावों के बारे में यदि अभी से आंकलन किया जाए, तो भाजपा हमेशा की तरह मजबूत स्थिति में ही है। इसके पीछे प्रमुख कारण कांग्रेस की आंतरिक कलह है, जो भाजपा की झोली में यह सीट डाल देती है। पाली विधान सभा क्षेत्र से जहां पिछले चुनावों में बिना किसी उठापटक के भाजपा से वर्तमान विधायक ज्ञानचंद पारख को टिकट दिया जाता रहा है । वहीं कांग्रेस का टिकट ऐन वक्त तक फाइनल ही नहीं हो पाता है । तब तब भाजपा फील्ड में अपनी स्थिति मजबूत कर लेती हैं। इस बार भी यही स्थितियां बन सकती हैं। जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है।
कांग्रेस को इसलिए हो सकता है नुकसान
अगर इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी नगरपरिषद के पूर्व सभापति और 1998 में कांग्रेस प्रत्याशी रहे केवलचंद गुलेच्छा को, 2018 में कांग्रेस प्रत्याशी रहे महावीर सिंह सुकरलाई को, पूर्व महिला कांग्रेस जिलाध्यक्ष सुमित्रा जैन या नीलम बिडला को अपना प्रत्याशी बनाती है, तोे 1993 से लगातार चुनाव लडकर कांग्रेस की हार का कारण बन रहे भीमराज भाटी का निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ना तय है। जिसके चलते कांग्रेस की जीत मुश्किल हो जाएगी। क्योंकि भाटी को जो वोट मिलते हैं, वे वोट सीधे-सीधे कांग्रेेेस के खाते में से कम होते हैं।यदि कांग्रेस भीमराज भाटी को टिकट देती है, तो सभी कांग्रेसी एकजुट होकर उन्हें पराजित करने में जुट जाएंगे, जैसा कि वर्ष 2003 और 2013 में इन्हें कांग्रेस से टिकट देने पर हो चुका है।
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भीमराज भाटी, पूर्व विधायक पाली
- फोटो : अमर उजाला
निर्दलीय और कांग्रेस के समीकरण
1993 में निर्दलीय चुनाव जीत चुके पूर्व विधायक भीमराज भाटी पाली विधानसभा से फिर 1998 में निर्दलीय चुनाव लडे, भैरोसिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बनने पर खाली हुई बाली विधानसभा सीट से 2002 में उप चुनावों में कांग्रेस प्रत्याशी रहे, 2003 और 2013 में पाली से कांग्रेस के सिंबल पर चुनाव लड़ा, उसके बाद 2008 और 2018 में निर्दलीय चुनाव लड़े और पराजित हुए। लेकिन इनके चुनाव लड़ने के चलते कांग्रेस हमेशा पाली हारती रही। इस बार भी भाटी कांग्रेस से टिकट मांगेंगे और टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। जिसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होना तय है और यदि भाटी को कांग्रेस से टिकट दे भी दिया जाता है तो कांग्रेस के टिकट के सभी दावेदार एक होकर भाटी को हराने में लग जाएंगे जैसा कि 2003 और 2013 में हुआ है। और तो और भीमराज भाटी स्वयं इस गणित को जानते हैं । इसलिए उनका भी यह मानना है कि पाली विधासभा सीट पर काबिज होना कांग्रेस के लिए बहुत ही मुश्किल है।
भाजपा से पहली मर्तबा दावेदारों की लंबी लाइन
पूर्व सांसद पुष्प जैन, भाजपा के जिला महामंत्री सुनील भंडारी, पूर्व यूआईटी चेयरमैन संजय ओझा, भाजपा के शहर अध्यक्ष एवं ग्रामीण अध्यक्ष रह चुके पुखराज पटेल, भाजपा ओबीसी मोर्चा के पूर्व जिला उपाध्यक्ष एवं भाजयुमो के पूर्व जिला संयोजक भंवरनाथ योगी सहित कई और दावेदार टिकट मांगेंगे।