Rajasthan News: 'काले सोने' की सुरक्षा में दिन-रात चौकस रहते हैं किसान, तैयारियों में क्या-क्या? सबकुछ जानिए
Rajasthan: इमरजेंसी जैसे मामलों में भी किसान अपने अफीम के खेत को नहीं छोड़ पाते हैं। किसान स्वयं या उनके परिवार के सदस्य खेत पर रहते हैं। इन दोनों विवाह का सीजन भी चल रहा है तो किसानों को खेत पर ही रहना पड़ता है।
आगामी दिनों में अफीम की लुगाई एवं चिराई का काम शुरू होगा लेकिन जब तक यह कार्य पूरा नहीं हो जाता किसानों के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी निकलने वाली है। काले सोने के रूप में शुमार अफीम की फसल की सुरक्षा करना किसानों के लिए भारी पड़ रहा है। फसल को मौसम से बचाना काफी मुश्किल हो रहा है। पशु पक्षियों से बचाने में दिन रात लगे हुए हैं।
अफीम के डोडो को तोते तथा नीलगाय सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते है। इससे बचने के लिए किसान अब जाल लगाने लगाने लगे हैं। इधर, जिले के खेतों में डोडे पकने की कगार पर है। 25 फरवरी के बाद मौसम अनुकूल रहा तो डोडे के चीरे लगाने का क्रम शुरू हो जाएगा।
इन दिनों फसल अपनी पूरी अवस्था में चल रही है। अब किसानों ने खेतों पर डेरा डाल दिया है। अफीम की फसल बढ़ने के साथ ही किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें भी बढ़ रही है। किसान परिवारों को फसल की सुरक्षा में दिन-रात खेतों में ही गुजारा करना पड़ रहा है। किसान अपनी फसल को प्राकृतिक प्रकोप, मवेशियों और पक्षियों से सुरक्षा करने तथा अफीम तस्करों से भी बचाने में जुटे हैं। भदेसर तहसील क्षेत्र के अफीम काश्तकार मुकेश धाकड़ ने बताया कि अफीम को काली देवी के रूप में पूजने की मान्यता है। इसे काला सोना भी कहा जाता है।
वर्तमान समय में सुखवाड़ा क्षेत्र के किसान सुरक्षा के लिए कई किसानों ने खेतों पर झोपड़ियां बना ली है। इसमें रह कर किसान दिन-रात रखवाली कर रहे हैं। अफीम की फसल पर फूल और डोडे आते ही मवेशियों और प्राकृतिक प्रकोप से भी खतरा कम नहीं होता है। किसानों ने मवेशियों से फसल की सुरक्षा के लिए तारबंदी कर लोहे की जालियां लगा दी है।
प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए भी जतन
किसान मुकेश धाकड़ ने बताया कि प्राकृतिक प्रकोप से बचाव के लिए अफीम की फसल के चारों तरफ मक्का की बुवाई करते हैं। इससे शीत लहर और पाले से अफीम को नुकसान नहीं पहुंचता है। कई किसानों ने नील गायों से बचने के लिए खेत के चारों और 1 दर्जन से अधिक साड़ियां लगा रखी है।
विभाग कर रहा पैमाईश का कार्य
इधर, नारकोटिक्स विभाग से खेती को लेकर जानकारी ली है। इसमें सामने आया कि विभाग खेतों में जाकर बुवाई की गई फसल की नपती में जुटा हुआ है। इसके लिए विभाग की विभिन्न टीम का गठन किया गया है। जिले में करीब 21 हजार अफीम काश्तकार हैं। इसमें से 30 फीसदी किसानों को सीपीएस पद्धति से तो 70 फीसदी किसानों को परम्परागत खेती के लिए बुवाई के लाइसेंस मिले हैं।
खेत पर ही चल रहा किसानों का चूल्हा
इधर, जानकारी में सामने आया कि अफीम की खेती में किसान का पूरा परिवार लगता है। करीब 2 महीने तक किसानों का पूरा परिवार खेत पर ही रहता है। यहां तक चूल्हा भी खेत पर ही जलता है। परिवार के सभी सदस्यों का का खाना खेत पर ही बन रहा है।
बीमारी हो या विवाह, खेत पर ही निकलता समय
इमरजेंसी जैसे मामलों में भी किसान अपने अफीम के खेत को नहीं छोड़ पाते हैं। किसान स्वयं या उनके परिवार के सदस्य खेत पर रहते हैं। इन दोनों विवाह का सीजन भी चल रहा है तो किसानों को खेत पर ही रहना पड़ता है।
बीमारी हो तो अभी परिवार के सदस्य का खेत पर रहना जरूरी हो जाता है। चित्तौड़ के निकट रोजड़ा निवासी सुरेश गाड़री ने बताया कि उसके परिवार में विवाह समारोह है। लेकिन अफीम की चिंता उन्हें हर समय रहती है। ऐसे में उन्हें या परिवार का सदस्य खेत पर जरूर मिलता है। वहीं दूसरी तरफ विवाह समारोह की रस्में भी जारी है।