थार मरूस्थल के बीच बसा राजस्थान का जैसलमेर अपनी पीले पत्थर की इमारतों के लिए जाना जाना चाहता है। 'गोल्डन सिटी' के नाम से मशहूर यह शहर पाकिस्तान की सीमा और थार रेगिस्तान के पास है। जैसलमेर किला शहर का सबसे प्रमुख पर्यटन स्थल है। इसे सोनार किला (द गोल्डन फोर्ट) भी कहा जाता है।
इसके अंदर दुकानें, होटल और प्राचीन हवेलियां (घर) आज भी मौजूद हैं, जहां पीढ़ी दर पीढ़ी लोग रहते आ रहे हैं। इसके अलावा भी जैसलमेर की कई ऐसी खासियत हैं, जो आपको जाननी चाहिए। आज हम आपको यहां के 12 प्रमुख पर्यटन स्थल और शहर के इतिहास के बारे में बताएंगे, आइए जानते हैं...
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जैसलमेर का किला
- फोटो : सोशल मीडिया
जैसलमेर का किला
यह किला एक वर्ल्ड हैरिटेज साइट है। थार मरूस्थल के त्रिकुटा पर्वत पर बना यह किला बहुत सी ऐतिहासिक लड़ाइयों का गवाह रहा है। पीले बलुआ पत्थरों से बना यह किला सूरज की रोशनी पड़ते ही सोने जैसा चमकने लगता है। इसीलिए इसे सोनार किला या गोल्डन फोर्ट भी कहा जाता है। यह एक विश्व धरोहर स्थल भी है। फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म फेलुदा के साथ कई अन्य फिल्मों की शूटिंग इस किले में की गई है। हर साल फरवरी महीने में यहां डेजर्ट फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है।
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नथमल जी की हवेली
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नथमल जी की हवेली
दीवान मोहता नथमल जैसलमेर राज्य में प्रधानमंत्री थे। उनके रहने के लिए यह हवेली बनाई गई थी। 19वीं शताब्दी महारावल बेरीसाल और हाथी और लूलू नाम के दो वास्तुकार भाइयों ने इस हवेली का निर्माण किया था। हवेली के मुख्य दरवाजे पर दो पत्थर के हाथी देखकर लगता है कि यह आपके स्वागत के लिए खड़े हैं।
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जैसलमेर सरकारी संग्रहालय
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जैसलमेर सरकारी संग्रहालय
यह संग्रहालय जैसलमेर आने वाले पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। इस संग्रहालय में प्रदेश के राज्य पक्षी गोडावण की ट्रॉफी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। यहां 7वीं और 9वीं शताब्दी की परंपरागत घरेलू वस्तुओं, रॉक-कट क्रॉकरी, आभूषण और प्रतिमाएं आदि भी मौजूद हैं।
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सालिम सिंह की हवेली
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सालिम सिंह की हवेली
300 साल पुरानी यह हवेली मोर के पंखों जैसी गोलाई लिए छज्जों और मेहराबों से सजी है। इसमें जैसलमेर के एक दुर्जेय प्रधानमंत्री सालिम सिंह का निवास था। इस हवेली का निर्माण 18वीं शताब्दी की शुरुआत में किया गया था। इसका एक हिस्सा अब भी इसके वंशजों के अधीन है। ऊंचे मेहराबदार छत में खांचे बांटकर मोर के आकार से अलंकरण तैयार किए गए हैं। कहा यह भी जाता है कि, यहां दो लकड़ी की मंजिलें भी थी, जो इसे महाराजा के महल के समान ऊंचाई प्रदान करती थीं। हालांकि, बाद में इसे तोड़ दिया गया।