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राजस्थान निकाय चुनाव: बूंदी में भाजपा-कांग्रेस में कांटे की टक्कर, बहुमत से चूके तो निर्दलीय करेंगे फैसला

Fri, 28 Aug 2026 10:01 AM IST
बूँदी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बूंदी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बूंदी Published by: बूँदी ब्यूरो Updated Fri, 28 Aug 2026 10:01 AM IST
सार

बूंदी नगर परिषद चुनाव में सभापति पद सामान्य होने से सियासी मुकाबला दिलचस्प हो गया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों बहुमत का दावा कर रही हैं। यदि कोई दल स्पष्ट बहुमत से चूका तो 3 से 5 निर्दलीय पार्षद सत्ता और सभापति का फैसला कर सकते हैं।

 

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Rajasthan Civic Polls: contest between BJP and Congress in Bundi Independents to play kingmaker
बूंदी में 60 वार्डों की जंग, - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

छोटी काशी बूंदी को जल्द ही नया प्रथम नागरिक यानी नगर परिषद का सभापति मिलने जा रहा है। 9 सितंबर को होने वाले नगर निकाय चुनाव को लेकर शहर की सियासत गरमा गई है। सभापति पद सामान्य होने के बाद दावेदारों की संख्या बढ़ गई है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही नगर परिषद में अपना बोर्ड बनाने के दावे कर रही हैं, लेकिन सबसे दिलचस्प स्थिति तब बन सकती है, जब दोनों में से कोई दल बहुमत के आंकड़े से एक-दो सीट दूर रह जाए। ऐसी स्थिति में निर्दलीय पार्षद किंगमेकर की भूमिका में आ सकते हैं।

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बूंदी नगर परिषद में इस बार 60 वार्ड हैं और करीब 91 हजार 345 मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इनमें 46 हजार 190 पुरुष और 45 हजार 155 महिला मतदाता शामिल हैं। वर्तमान में नगर परिषद में भाजपा का बोर्ड है, जबकि वार्डों की मौजूदा तस्वीर में कांग्रेस के 31 और भाजपा के 29 पार्षद बताए जा रहे हैं। ऐसे में चुनावी मुकाबला पहले से ही बेहद कांटे का माना जा रहा है।
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सामान्य सीट ने बढ़ाई सभापति पद की दावेदारी
नगर परिषद सभापति का पद सामान्य वर्ग के लिए तय होने के बाद पुराने राजनीतिक चेहरों के साथ नए दावेदार भी सक्रिय हो गए हैं। टिकट की दौड़ में शामिल नेताओं के लिए इस बार चुनाव सिर्फ पार्षद बनने तक सीमित नहीं है, बल्कि कई नेताओं की नजर सीधे सभापति की कुर्सी पर है। वार्डों के आरक्षण ने भी कई नेताओं के राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। कुछ मजबूत दावेदारों के वार्ड आरक्षित हो गए हैं, तो कहीं महिला सीट आने से पुराने समीकरण बदल गए। ऐसे में टिकट वितरण दोनों दलों के लिए सबसे बड़ी परीक्षा माना जा रहा है। एक गलत टिकट पूरे चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
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भाजपा का दावा, डबल इंजन से विकास को मिलेगी रफ्तार
भाजपा चुनाव में केंद्र और राज्य में अपनी सरकार को बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है। पार्टी का तर्क है कि केंद्र और राजस्थान दोनों जगह भाजपा की सरकार है। ऐसे में यदि बूंदी नगर परिषद में भी भाजपा का बोर्ड बनता है तो शहर के विकास कार्यों में बेहतर तालमेल और तेजी आएगी। पार्टी प्रभारी महेश विजय का कहना है कि भाजपा इसी संदेश के साथ मतदाताओं के बीच पहुंच रही है। पार्टी के सामने चुनौती मौजूदा बोर्ड के कामकाज को जनता के सामने रखने और स्थानीय स्तर पर मजबूत प्रत्याशियों के जरिए 29 से अधिक सीटें हासिल करने की है।

पुराने बोर्ड की वापसी के लिए मैदान में कांग्रेस
दूसरी ओर कांग्रेस पिछले नगर निकाय चुनाव के प्रदर्शन को आधार बनाकर मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस का कहना है कि भाजपा शासन के दौरान आमजन से जुड़े मुद्दों, विकास कार्यों और स्थानीय समस्याओं को लेकर जनता में नाराजगी है। पार्टी इन्हीं मुद्दों को चुनावी मुद्दा बनाकर भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश कर रही है।

कांग्रेस विधायक हरिमोहन शर्मा का कहना है कि पिछले नगर निकाय चुनाव में बूंदी में कांग्रेस का बोर्ड बना था। बाद में प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद तत्कालीन कांग्रेस सभापति के निलंबन के पश्चात भाजपा की ओर से सरोज अग्रवाल को सभापति नियुक्त किया गया। उनका कार्यकाल करीब डेढ़ साल रहा। इस राजनीतिक घटनाक्रम का असर भी मौजूदा चुनावी चर्चा में दिखाई दे रहा है।

बहुमत से दूर रहे तो निर्दलीय बनेंगे किंगमेकर
बूंदी चुनाव की सबसे दिलचस्प तस्वीर तब बन सकती है, जब भाजपा और कांग्रेस में से कोई भी दल स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं कर पाए। राजनीतिक गलियारों में 3 से 5 निर्दलीय पार्षदों की संभावित भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यदि दोनों प्रमुख दल बहुमत के आंकड़े से एक-दो सीट दूर रह जाते हैं तो यही निर्दलीय पार्षद सभापति की कुर्सी का फैसला कर सकते हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम के बाद निर्दलीयों को अपने पक्ष में लाने की कोशिशें तेज हो सकती हैं। यही वजह है कि इस बार कई वार्डों में भाजपा और कांग्रेस के बागी उम्मीदवार भी चुनावी समीकरण बिगाड़ सकते हैं। टिकट नहीं मिलने से नाराज मजबूत दावेदार यदि निर्दलीय मैदान में उतरते हैं तो मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय हो सकता है। ऐसे उम्मीदवार जीतने में सफल रहे तो चुनाव बाद उनकी सियासी अहमियत और बढ़ सकती है।

इस बार पार्षद के साथ सभापति का चेहरा भी होगा मुद्दा
नगर परिषद चुनाव में मतदाता वार्ड प्रत्याशियों के साथ-साथ संभावित सभापति के चेहरे को भी ध्यान में रख सकते हैं। दोनों दलों को ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देना होगा, जो न केवल अपने वार्ड में मजबूत हों, बल्कि बोर्ड के बहुमत के गणित में भी पार्टी के लिए अहम साबित हों। यही कारण है कि टिकट वितरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने बड़ी चुनौती है। मजबूत दावेदार को टिकट नहीं मिलने पर बगावत की संभावना है, जबकि सामाजिक और वार्ड समीकरण में चूक भी पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है।

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तीनों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस, लेकिन नगर परिषद की लड़ाई अलग
बूंदी जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर वर्तमान में कांग्रेस के विधायक हैं। बूंदी से हरिमोहन शर्मा, केशवरायपाटन से सी.एल. प्रेमी और हिंडोली से अशोक चांदना विधायक हैं। दूसरी ओर प्रदेश में भाजपा की सरकार है। ऐसे में नगर निकाय चुनाव स्थानीय राजनीति के साथ-साथ दोनों दलों के लिए अपने राजनीतिक प्रभाव को परखने का मौका भी है। भाजपा जहां केंद्र और राज्य सरकार के कामकाज को आधार बनाकर नगर परिषद में बोर्ड बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस स्थानीय मुद्दों और सरकार के खिलाफ नाराजगी को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है।


9 सितंबर को होगा फैसला
बूंदी नगर परिषद में 60 वार्ड हैं और सामान्य सभापति पद ने चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। असली लड़ाई टिकट वितरण से शुरू होकर मतदान और फिर बहुमत के गणित तक पहुंचेगी। कौन सा दल कितने मजबूत प्रत्याशी मैदान में उतारता है, कितने बागी चुनाव लड़ते हैं और निर्दलीयों की संख्या कितनी रहती है, इन सवालों के जवाब चुनाव परिणाम के बाद सामने आएंगे।

फिलहाल बूंदी की सियासत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा अपना मौजूदा बोर्ड बचा पाएगी या कांग्रेस पुराने बोर्ड की वापसी करेगी। लेकिन यदि मुकाबला बहुमत के आंकड़े से एक-दो सीट दूर जाकर अटक गया तो सभापति की कुर्सी का फैसला उन निर्दलीय पार्षदों के हाथ में हो सकता है, जिनकी संख्या भले कम हो, लेकिन चुनाव परिणाम के बाद उनकी सियासी कीमत सबसे ज्यादा हो सकती है।

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