धार्मिक नगरी उज्जैन में एक ऐसा मंदिर है, जहां भगवान के दर्शन करने मात्र से ही श्रद्धालुओं द्वारा किए गए धर्म और तप बढ़ जाते हैं। मंदिर में अष्टमी और चतुर्दशी को भगवान का पूजन-अर्चन करने का विशेष महत्व है, यही कारण है कि बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस मंदिर में दर्शन-पूजन करने पहुंचते हैं और भगवान के दर्शनों का लाभ लेते हैं।
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पूजन से मिलती है धर्म और तप की प्राप्ति
- फोटो : अमर उजाला
मंदिर के पुजारी पंडित गौरव उपाध्याय ने बताया कि श्री गुहेश्वर महादेव का मंदिर रामघाट पर श्री पिशाचमुक्तेश्वर मंदिर के दक्षिण में स्थित है, जो कि एक सुरंग की तरह है। यहां भगवान गुहेश्वर भूतल में विराजमान हैं। अति प्राचीन श्री गुहेश्वर महादेव का मंदिर अत्यंत चमत्कारी है, जो कि 84 महादेव में दूसरे स्थान पर आते हैं। मंदिर में भगवान की काले पत्थर की प्रतिमा अत्यंत चमत्कारी एवं दिव्य है। प्रवेश द्वार के ऊपर मध्य में गणेशजी की प्रतिमा है, जो कि अत्यंत दिव्य है। मंदिर के पुजारी पंडित गौरव उपाध्याय ने बताया कि वैसे तो गुहेश्वर महादेव के दर्शन मात्र से ही समस्त पापों का नाश हो जाता है, लेकिन मान्यता है कि जो व्यक्ति शिवलिंग का दर्शन पूजन करता है उसके धर्म और तप भी कभी कम नहीं होते हैं। अष्टमी तथा चतुर्दशी तिथि पर इस शिवलिंग के दर्शन करने से मनुष्य के पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
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84 महादेव में दूसरे स्थान पर हैं गुहेश्वर महादेव
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गुहेश्वर महादेव की पौराणिक कथा
पौराणिक काल में एक महायोगी थे जिनका नाम था मंकणक। वे बहुत ही वेद पाठी और वेद वेदांग के पारंगत ज्ञाता थे। सिद्धि की कामना के कारण वे हमेशा तपस्या में लीन रहते थे। एक बार देवदारु वन में तपस्या करने के दौरान में कुश का कांटा उनकी उंगली में लग गया किन्तु रक्त के स्थान पर शाक रस (औषधि के सामान) बहने लगा। इस घटना को देख कर वे अत्यंत प्रसन्न हुए और अभिमानपूर्वक नृत्य करने लगे कि उनकी सिद्धि के फल से ही यह हुआ है। चुकी वो सिद्धि पा चुके थे इसलिए तप के बल से सारे जगत में हाहाकार मच गया। उनके इस तप से नदियां उल्टी बहने लगी तथा ग्रहों की गति उलट गई। इस गंभीर स्तिथि को देखकर सभी देवी-देवता भगवान देवाधिदेव महादेव के पास पहुंचे और उनसे आग्रह किया की वे ऋषि को रोकें।
देवताओं की विनती सुनकर शिवजी ऋषि के पास पहुंचे और उन्हें नृत्य करने से रोकने लगे। लेकिन ऋषि को सिद्धि के अभिमान में ध्यान नहीं रहा और वह शिवजी को भी सिद्धि का अभिमान बताने लगे। ऋषि को अभिमान से मुक्त करने के लिए शिवजी ने अपनी अंगुली के अग्र भाग से भस्म निकाली और ऋषि से कहा कि देखो मुझे इस सिद्धि पर अभिमान नहीं है और मैं नटराज होकर भी नाच भी नहीं रहा हूं। शिवजी की बात सुनकर ऋषि काफी लज्जित हुए और उन्होंने क्षमा मांगी और साथ ही प्रार्थना की कि उनके तप में वृद्धि करने का उपाय सुझाये। तब शिवजी ने कहा कि महाकाल वन में सप्तकुल में उत्पन्न लिंग हैं, उसके दर्शन करो, उस लिंग की पूजा अर्चना करो। देवाधिदेव महादेव के कहने पर ऋषि ने ऐसा ही किया जिससे ऋषि को सूर्य के सामान तेज प्राप्त हुआ और उन्होंने सिद्धि का उपयोग जन कल्याण में किया। छोटी सा गुफामयी स्थान पर होने के कारण लिंग गुहेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ।