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महाकाल शाही सवारी: राजा खुद चलते थे पालकी के आगे, क्या होता था संकेत? भोज से सिंधिया-होलकर तक अनोखा है इतिहास

Mon, 18 Aug 2025 11:15 AM IST
अर्पित याज्ञनिक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन Published by: अर्पित याज्ञनिक Updated Mon, 18 Aug 2025 11:15 AM IST
सार

Mahakal Shahi Sawari 2025: ग्यारहवीं शताब्दी की पांडुलिपियों में राजाधिराज भगवान महाकाल की सवारी का उल्लेख मिलता है, जब परमार वंश के राजा भोज ने इसे राजकीय उत्सव का रूप दिया और लोक कलाकारों व नटों को सम्मिलित किया। मराठा काल में राणौजी सिंधिया ने मंदिर का जीर्णोद्धार कर सवारी को नई भव्यता प्रदान की और स्वयं भी इसमें सम्मिलित होते थे।

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Mahakal Shahi Sawari: Unique History from Bhoj Era to Scindia-Holkar, Know Royal Traditions of Ujjain
शाही सवारी के लिए तैयार होते राजाधिराज की बीते वर्ष की तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला

राजाधिराज भगवान महाकाल की सवारी न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह उज्जैन की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। एक दौर था, जब सिंधिया और होलकर महाराज सवारी में लाव-लश्कर, सेना के साथ सम्मिलित होते थे। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी श्रद्धा और भव्यता से निभाई जा रही है। वर्षों से सवारी के साथ राजा-महाराजा की पोशाक धारण कर सबके आकर्षण का केंद्र बनने वाले स्वामी मुस्कुराके यानी पं. शैलेन्द्र व्यास ने बताया कि इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ग्यारहवीं शताब्दी की पांडुलिपियों में महाकाल सवारी का उल्लेख मिलता है।


 

Mahakal Shahi Sawari: Unique History from Bhoj Era to Scindia-Holkar, Know Royal Traditions of Ujjain
राजाधिराज की सवारी की बीते वर्ष की तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला
राजा भोज ने बनाया राजकीय उत्सव
परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने इस परंपरा को एक राजकीय उत्सव का रूप दिया था। उन्होंने सवारी में नटों, लोक कलाकारों, संगीतकारों और विभिन्न लोक परंपराओं को सम्मिलित किया। राजा भोज स्वयं भी पालकी के आगे अपने लाव-लश्कर के साथ चलकर भगवान महाकाल को राजकीय सम्मान प्रदान करते थे।

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Mahakal Shahi Sawari: Unique History from Bhoj Era to Scindia-Holkar, Know Royal Traditions of Ujjain
महाकाल की सवारी में शामिल होते थे राजवंश। - फोटो : अमर उजाला
राणौजी सिंधिया ने सवारी परंपरा को नवजीवन दिया
सवा दो सौ साल पहले, मराठा शासनकाल में सिंधिया वंश के संस्थापक राणौजी सिंधिया ने महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया और भगवान महाकाल की सवारी परंपरा को नवजीवन दिया।
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Mahakal Shahi Sawari: Unique History from Bhoj Era to Scindia-Holkar, Know Royal Traditions of Ujjain
शाही सवारी की बीते वर्ष की तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला
राणौजी स्वयं भी सवारी में शामिल होते थे
उन्होंने इसमें नए रथों, गजराजों और सजीव लोक परंपराओं को जोड़ा, जिससे यह आयोजन और अधिक भव्य बन गया। राणौजी स्वयं भी सवारी में शामिल होते थे और पालकी के आगे चलकर भगवान महाकाल को राजाधिराज का दर्जा देते थे। इसके बाद स्वतंत्रता पूर्व काल तक सिंधिया और होलकर राजवंशों के प्रमुख महाकाल की सवारी में राजकीय रूप से सम्मिलित होते रहे। वे पालकी के आगे चलकर यह संकेत देते थे कि राज्य का वास्तविक शासक स्वयं महाकालेश्वर ही हैं।
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शाही सवारी की बीते वर्ष की तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला
शिव की शक्ति का अनुग्रह कराती है बाबा महाकाल की सवारी
महाकाल की सवारी एक भव्य जुलूस है, जो भगवान महाकालेश्वर को समर्पित है। यह जुलूस हर साल श्रावण मास के भाद्रपद शुक्ल पक्ष में निकाला जाता है। इस सवारी का आयोजन श्रावण भादौ माह के अवसर पर उज्जैन के महाकाल मंदिर में होता है। यह भारतीय संस्कृति और धार्मिक आध्यात्मिकता का महत्वपूर्ण प्रतीक है। इस सवारी में महाकाल की मूर्ति को पारंपरिक तरीके से सवारी में निकाला जाता है, जिसमें विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक धाराओं को सम्मिलित किया जाता है। महाकाल की सवारी का आयोजन बड़ी धूमधाम से होता है और यह लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है। यह सवारी ध्यान और आध्यात्मिकता के माहौल में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है और लोगों को शिव की शक्ति और अनुग्रह का अनुभव कराती है।

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