राजाधिराज भगवान महाकाल की सवारी न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह उज्जैन की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रमाण है। एक दौर था, जब सिंधिया और होलकर महाराज सवारी में लाव-लश्कर, सेना के साथ सम्मिलित होते थे। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी श्रद्धा और भव्यता से निभाई जा रही है। वर्षों से सवारी के साथ राजा-महाराजा की पोशाक धारण कर सबके आकर्षण का केंद्र बनने वाले स्वामी मुस्कुराके यानी पं. शैलेन्द्र व्यास ने बताया कि इतिहासकारों और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, ग्यारहवीं शताब्दी की पांडुलिपियों में महाकाल सवारी का उल्लेख मिलता है।
महाकाल शाही सवारी: राजा खुद चलते थे पालकी के आगे, क्या होता था संकेत? भोज से सिंधिया-होलकर तक अनोखा है इतिहास
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, उज्जैन
Published by: अर्पित याज्ञनिक
Updated Mon, 18 Aug 2025 11:15 AM IST
सार
Mahakal Shahi Sawari 2025: ग्यारहवीं शताब्दी की पांडुलिपियों में राजाधिराज भगवान महाकाल की सवारी का उल्लेख मिलता है, जब परमार वंश के राजा भोज ने इसे राजकीय उत्सव का रूप दिया और लोक कलाकारों व नटों को सम्मिलित किया। मराठा काल में राणौजी सिंधिया ने मंदिर का जीर्णोद्धार कर सवारी को नई भव्यता प्रदान की और स्वयं भी इसमें सम्मिलित होते थे।
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