मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में विंध्याचल के पहाड़ पर एक हजार फीट ऊंचाई पर विराजमान विजयासन मैया का दरबार सलकनपुर नवरात्र के लिए तैयार है। प्राचीन श्रीदेवी धाम शक्ति पीठ सलकनपुर देश और प्रदेश के लाखों श्रद्धालुओं की अस्था का केन्द्र है। नवरात्रि में प्रतिदिन लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां आकर माता के दरबार में स्तुति कर अपनी मनोकामना पूर्ण करेंगे। नवरात्र पर्व 26 सितंबर से शुरू हो रहे हैं। नवरात्र पर्व को लेकर इस साल भक्तों में काफी उत्साह देखा जा रहा है।
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4-5 लाख भक्तों के आने की उम्मीद
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कोरोना के सभी प्रतिबंध हटने के बाद इस साल प्रदेश भर में 4-5 लाख भक्तों के आने की उम्मीद है। नौ दिवसीय उत्सव के लिए सलकनपुर में तमाम सुविधाएं जुटाई जा रहीं हैं। खासकर बुजुर्ग और अन्य कमजोर व्यक्ति अंडर पास सहित ट्राइसाइकिल के जरिए पहुंचकर मैया के दर्शन आसानी से कर सकेंगे। 80 सीसीटीवी से भक्तों पर नजर रखी जाएगी। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम भी किए जा रहे हैं।
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मध्यप्रदेश की हृदयस्थली पुण्य सलिला मां नर्मदा
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मध्यप्रदेश की हृदयस्थली पुण्य सलिला मां नर्मदा के तट और सीहोर जिले की बुदनी तहसील से 25 किलोमीटर और होशंगाबाद से 35 किलोमीटर और राजधानी भोपाल से 70 किलोमीटर दूरी पर विंध्याचल की हसीन वादियों में प्रकृति ने अपनी अनमोल छटा बिखेरी है। जहां देवीधाम सलकनपुर है। चारों ओर मनोहारी पर्वत श्रृंखलाएं हैं, जिनमें एक पर्वत पर मां विंध्यवासिनी विजयासेन देवी का भव्य मंदिर बना हुआ है।
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भक्तों की कुलदेवी
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शारदीय और चैत्रीय नवरात्रि में मां की चौखट पर माथा टेकने दूरदराज से लाखों लोग आते हैं और हरियाली से भरे इस 1000 फीट ऊंचे पर्वत पर अलौगिक सौंदर्य के बीच मां की सुंदर प्रतिमा के दर्शन, परिक्रमा, वंदना, स्तुति कर अपने मन की मुरादें पूरी पाते हैं। अनेक भक्तों की यह कुलदेवी भी हैं, इसलिए यहां भक्तों की भीड़ ज्यादा उमड़ती है। जानकारों के मुताबिक, मां विजयासन माता पार्वती का ही अवतार-स्वरूप है। मां ने रक्तबीज नामक राक्षस का वध कर सृष्टि की रक्षा की थी।
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6,000 साल पुराना है मंदिर
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मान्यता है कि यह मंदिर 6,000 साल पुराना है, जहां जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंचने पर इस मंदिर का जीर्णोद्धार अनेक बार किया जा चुका है। इसकी व्यवस्था भोपाल नवाब के संरक्षण में होती थी, तब वहां पर अखंड धूनी और अखंड ज्योति स्थापित की जा चुकी थी, जो सालों से आज भी प्रज्वलित है। गर्भगृह में देवी की प्रतिमा स्वयंभू है, जिसे किसी के द्वारा तराशा नहीं गया, परंतु बाद में चांदी के नेत्र एवं मुकुट आदि से देवी को सजाया गया है।