मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि बच्चे चुनौतियों से घबराएं नहीं, बल्कि पूरी शिद्दत के साथ उनका सामना करें। छोटी से छोटी बात पर ध्यान दें। छोटी-छोटी चीजों को नजरअंदाज करना जीवन में नुकसानदेह हो सकता है। स्कूलों में स्वच्छता को जनांदोलन बनाएं। विद्यार्थी और शिक्षक मिलकर स्कूलों में सफाई करने में संकोच नहीं करें।
मुख्यमंत्री योगी ने मेधावियों को दिए सफलता के मंत्र, बोले- मुश्किल आए तो समझो अच्छे परिणाम आएंगे
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मेहनत और पुरुषार्थ से मिलेगी सफलता
मुख्यमंत्री ने बच्चों से कहा कि विषम परिस्थिति है तो मानो कि अच्छे परिणाम आने वाले हैं। अच्छी परिस्थिति है तो उसे आगे तक बनाए रखने के लिए प्रयास करें। बच्चों को अपनी मेहनत और पुरुषार्थ के दम पर सफलता की नई ऊंचाई छूनी है।
बच्चों से स्कूलों में सफाई कराने में कोई संकोच नहीं
मुख्यमंत्री ने कहा कि किसी भी सरकारी चीज को लावारिस या अनाथ मानने की प्रवृत्ति खराब है। सार्वजनिक संपत्ति सभी की है, उसका संरक्षण करना हर नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है। स्कूल भी बच्चों का ही है, स्कूलों में बच्चे और शिक्षक सफाई करें तो उनकी शिकायत नहीं, सराहना करनी चाहिए।
योगी ने गोरखपुर स्थित अपने ट्रस्ट के पीजी कॉलेज का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 2008 से आज तक कोई सफाई कर्मचारी या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं है। कॉलेज परिसर की सफाई से लेकर सभी व्यवस्थाएं वहां के शिक्षक, कर्मचारी और विद्यार्थी मिलकर करते हैं।
पहले केवल परीक्षा, परिणाम और छुट्टियां होती थीं
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रदेश में पहले 3 महीने बोर्ड परीक्षाएं चलती थीं, तीन महीने में परिणाम आता था, तीन महीने त्योहार-पर्व की छुट्टियां होती थीं और तीन महीने महापुरुषों की जयंती की छुट्टियों में बीत जाते थे। हमने दो वर्ष में व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन किया है। अब परीक्षाएं मात्र 15 दिन में हो रही हैं, अप्रैल-मई तक सभी परिणाम जारी हो रहे हैं। महापुरुषों की जयंती पर छुट्टियों की जगह उनके बारे में बच्चों को जानकारियां दी जा रही हैं।
अभिभावकों को संदेश, शिक्षकों को नसीहत
मुख्यमंत्री ने समारोह में आए मेधावी विद्यार्थियों के अभिभावकों को भी संदेश दिया। कहा कि बच्चों के पहले शिक्षक माता-पिता हैं, वे घर-परिवार में जैसे संस्कार और वातावरण देंगे, बच्चों का व्यक्तित्व वैसा ही बनेगा। वहीं शिक्षकों को नसीहत देते हुए कहा कि गुरुकुल परंपरा में आचार्य में वेतनबोध, मानदेय बोध नहीं बल्कि कर्तव्यबोध होता था। स्कूलों के रखरखाव की जिम्मेदारी प्रधानाध्यापक या प्रधानाचार्य की है।