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पहली बार मंदिर में होगी माहवारी पर चर्चा, लखनऊ का ये विख्यात मंदिर बनेगा साक्षी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Updated Mon, 28 May 2018 02:59 PM IST
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mankameshwar mandir
- फोटो : amar ujala
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माहवारी...छि:...किचन में कुछ छूना नहीं.. अरे, धीरे बोलो...। समाज बढ़ा। जागरूकता बढ़ी। पर, माहवारी शब्द आज भी शर्मिंदगी और अपवित्रता से जुड़ा हुआ है। लखनऊ में यह संभवत: पहला मौका होगा जब किसी मंदिर में इस मुद्दे पर चर्चा होगी। मंदिर से इस मुद्दे पर जागरूकता की अलख जगेगी। यह अनूठी पहल करने जा रहा है मनकामेश्वर मंदिर। सोमवार को वर्ल्ड मेंस्ट्रुअल हाईजीन डे है। इस मौके पर पेश है अमर उजाला की विशेष रिपोर्ट।
mankameshwar mandir
- फोटो : amar ujala
आखिर मंदिर से शुरुआत क्यों
महंत देव्या गिरी से हमने ये सवाल किया कि आखिर मंदिर से इसकी शुरुआत क्यों? वह कहती हैं-दरअसल माहवारी को लेकर दकियानूसी सोच ने मिथक और भ्रांतियां पैदा की हैं। यह मुद्दा स्वच्छता और सेहत का है। पर, मां-दादी-नानी-चाची ने इसे गलत रूप दे दिया। बेटियों को ‘उन दिनों’ में अपनी पीड़ा को छिपाना तो सिखाया गया, पर हाईजीन का ख्याल रखना नहीं सिखाया गया। हमारे वक्त में हमें सिर्फ और सिर्फ रोकटोक, अपवित्रता, चुप रहना, शर्म करना ही सिखाया गया। हम भी भावी पीढ़ी को यही सोच तो नहीं देकर जा सकते। अस्वच्छता संक्रमण के साथ-साथ कई बड़ी बीमारियों का कारण बनती है। जरूरी है कि इस पर खुलकर बात हो। महंत देव्यागिरी कहती हैं, जहां तक सवाल मंदिरों में प्रवेश पर रोक का है तो बेटियों पर प्रतिबंध नहीं है। उस दौर में मां-दादी रोकती थीं। कहीं जाने आने से तो इसके पीछे तर्क यह था कि पांच दिनों की पीड़ा में बेटियां आराम कर सकें। काम का बोझ अधिक होता था, खानपान में भी बेटियों के साथ भेदभाव था। ऐसे में उनके लिए आराम ही राहत का एकमात्र विकल्प था। इस सोच को प्रतिबंध या निषेध का नाम दे दिया गया।
महंत देव्या गिरी से हमने ये सवाल किया कि आखिर मंदिर से इसकी शुरुआत क्यों? वह कहती हैं-दरअसल माहवारी को लेकर दकियानूसी सोच ने मिथक और भ्रांतियां पैदा की हैं। यह मुद्दा स्वच्छता और सेहत का है। पर, मां-दादी-नानी-चाची ने इसे गलत रूप दे दिया। बेटियों को ‘उन दिनों’ में अपनी पीड़ा को छिपाना तो सिखाया गया, पर हाईजीन का ख्याल रखना नहीं सिखाया गया। हमारे वक्त में हमें सिर्फ और सिर्फ रोकटोक, अपवित्रता, चुप रहना, शर्म करना ही सिखाया गया। हम भी भावी पीढ़ी को यही सोच तो नहीं देकर जा सकते। अस्वच्छता संक्रमण के साथ-साथ कई बड़ी बीमारियों का कारण बनती है। जरूरी है कि इस पर खुलकर बात हो। महंत देव्यागिरी कहती हैं, जहां तक सवाल मंदिरों में प्रवेश पर रोक का है तो बेटियों पर प्रतिबंध नहीं है। उस दौर में मां-दादी रोकती थीं। कहीं जाने आने से तो इसके पीछे तर्क यह था कि पांच दिनों की पीड़ा में बेटियां आराम कर सकें। काम का बोझ अधिक होता था, खानपान में भी बेटियों के साथ भेदभाव था। ऐसे में उनके लिए आराम ही राहत का एकमात्र विकल्प था। इस सोच को प्रतिबंध या निषेध का नाम दे दिया गया।
mahant divya giri
- फोटो : amar ujala
ऐसे आएगा बदलाव : परिचर्चा आज चार बजे मंदिर परिसर में
बदलाव कैसे आएगा, इस सवाल पर महंत कहती हैं, ‘माहवारी : शर्म नहीं सेहत की बात’ विषय पर सोमवार चार बजे मंदिर परिसर में परिचर्चा का आयोजन होगा। इसमें शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर इस अभियान पर बात करेंगे और इसे एक नया रूप देंगे। फिर अभियान के तहत हर महीने शहर में सार्वजनिक स्थानों पर मंदिर के सदस्य, सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम इस मुद्दे पर खुलकर बात करेगी। लोगों को जागरूक करेगी।
बदलाव कैसे आएगा, इस सवाल पर महंत कहती हैं, ‘माहवारी : शर्म नहीं सेहत की बात’ विषय पर सोमवार चार बजे मंदिर परिसर में परिचर्चा का आयोजन होगा। इसमें शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर इस अभियान पर बात करेंगे और इसे एक नया रूप देंगे। फिर अभियान के तहत हर महीने शहर में सार्वजनिक स्थानों पर मंदिर के सदस्य, सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम इस मुद्दे पर खुलकर बात करेगी। लोगों को जागरूक करेगी।
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GURUDWARA
- फोटो : amar ujala
उन दिनों में भी गुरुद्वारे में जाने पर कोई रोक नहीं
गुरुद्वारा तेग बहादुर अहिया गंज के हजूरी कथावाचक ज्ञानी जोगिन्दर सिंह जी कहते हैं कि सिख धर्म में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का अधिकार दिया गया है। हमारे गुरु मन की पवित्रता को महत्व देते हैं। अपवित्रता नहाने से दूर नहीं होती, बल्कि ज्ञान से दूर होती है। ‘सूतक कि करि रखीअै सूतक पवै रसोए, नानक सूतक ऐव न उतरै गिआन उतारे’ यानी रसोई में पकने वाले हर अन्न के दाने में जीव है। ऐसे बहुत से उदाहरण शुद्धता-अशुद्धता को लेकर दिए गए हैं, जिसकी व्याख्या सकारात्मक तरीके से की जाए तो स्पष्ट होगा कि महिला-पुरुष बराबर हैं, कोई अशुद्ध नहीं। सिख धर्म में महिलाएं उन पांच दिनों में भी गुरुद्वारे जाती हैं।
गुरुद्वारा तेग बहादुर अहिया गंज के हजूरी कथावाचक ज्ञानी जोगिन्दर सिंह जी कहते हैं कि सिख धर्म में महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का अधिकार दिया गया है। हमारे गुरु मन की पवित्रता को महत्व देते हैं। अपवित्रता नहाने से दूर नहीं होती, बल्कि ज्ञान से दूर होती है। ‘सूतक कि करि रखीअै सूतक पवै रसोए, नानक सूतक ऐव न उतरै गिआन उतारे’ यानी रसोई में पकने वाले हर अन्न के दाने में जीव है। ऐसे बहुत से उदाहरण शुद्धता-अशुद्धता को लेकर दिए गए हैं, जिसकी व्याख्या सकारात्मक तरीके से की जाए तो स्पष्ट होगा कि महिला-पुरुष बराबर हैं, कोई अशुद्ध नहीं। सिख धर्म में महिलाएं उन पांच दिनों में भी गुरुद्वारे जाती हैं।
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CHURCH
- फोटो : amar ujala
चर्च में भी कोई मनाही नहीं होती
चांसलर एंड स्पोक्सपर्सन डायस ऑफ लखनऊ, डॉ. डोनाल्ड एचआर डिसूजा कहते हैं कि प्रभु यीशू ने औरतों पर कोई रोकटोक नहीं लगाई है। बाइबिल दो भागों में है, एक यीशू केआने से पहले, दूसरा उनके आने के बाद। तीन हजार साल पहले रोकटोक थी, लेकिन यीशू ने आकर सुधार का नया अध्याय शुरू किया। महिलाओं को चर्च जाने की कोई मनाही नहीं है।
चांसलर एंड स्पोक्सपर्सन डायस ऑफ लखनऊ, डॉ. डोनाल्ड एचआर डिसूजा कहते हैं कि प्रभु यीशू ने औरतों पर कोई रोकटोक नहीं लगाई है। बाइबिल दो भागों में है, एक यीशू केआने से पहले, दूसरा उनके आने के बाद। तीन हजार साल पहले रोकटोक थी, लेकिन यीशू ने आकर सुधार का नया अध्याय शुरू किया। महिलाओं को चर्च जाने की कोई मनाही नहीं है।