मुझे सुविधाएं तो मेरी बहन को क्यों नहीं? ये सवाल है उस पीढ़ी का जो नई है। युवा है...। जिसमें जोश है। जज्बा है...। चीजों को अपने नजरिए से देखने, परखने और उसमें बदलाव करने की ललक है। वैसे ये महज सवाल नहीं। बदलाव के प्रति छटपटाहट है...। अकुलाहट है..। भेदभाव के प्रति रोष है...। ...तो ये एक नई उम्मीद भी है। ...और नई बयार भी। जरूरत है हर घर से ये सवाल उठे। तभी बेटा-बेटी में भेदभाव खत्म होगा।
बदलाव की मुहिम में बेटे भी बेटियों के साथ, बोले- जो सुविधाएं मुझे वो मेरी बहन को क्यों नहीं
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अपने हक के लिए करनी होगी आवाज बुलंद
शालिनी माथुर ने विद्यार्थियों से कहा, भारत का संविधान सभी को समानता का अधिकार देता है। अनुच्छेद-14 के अनुसार, जाति, लिंग और वर्ग के आधार पर किसी प्रकार भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इसके बावजूद महिलाओं को असमानता का शिकार होना पड़ता है। घर पर भी बेटे और बेटियों में भेद किया जाता है। हालांकि काफी बदलाव आया है। पर, अभी भी इसमें बहुत सुधार की जरूरत है। उन्होंने कहा, शिक्षा, सत्ता और संपत्ति हासिल करके ही महिलाएं सशक्त बन सकती हैं। महिलाओं को इनको हासिल करने के लिए प्रयास करना चाहिए।
नारी शक्ति है...बेटियां बनाएं अपनी पहचान
मनौवैज्ञानिक और काउंसलर डॉ. पीके खत्री ने बेटियों को प्रोत्साहित करते हुए कहा, नारी शक्ति है। उसे अपनी अलग पहचान बनानी चाहिए। भले ही हमारा समाज पुरुष प्रधान हो, पर इंदिरा नूई, सुनीता विलियम्स, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल जैसी महिलाओं ने अपनी अलग पहचान बनाई है। पहले महिलाओं के लिए-नारी तुम अबला हो..... जैसी कविता हुआ करती थी। अब ये- नारी तुम श्रद्धा हो...तक आ पहुंची है। नारी को श्रद्धा के पात्र से अब सशक्तीकरण तक लाना है।
बदलनी होगी हर वह सोच जो गैरबराबरी की वजह बनती है
विद्यालय की प्रबंधक तरु सक्सेना ने कहा, महिलाएं किसी से पीछे नहीं हैं। हमें अपनी सोच बदलनी चाहिए। उन्होंने विद्यालय में हुए एक कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि - सभी विद्यार्थियों को जब किसान का चित्र बनाने को कहा गया तो ज्यादातर ने पुरुष किसान का ही चित्र बनाया। महिलाएं भी तो खेतों में पुरुषों के बराबर काम करती हैं। इसके बावजूद आम धारणा है कि किसान सिर्फ पुरुष ही होते हैं और वही मेहनत करते हैं। तरु सक्सेना ने सभी विद्यार्थियों को इस बदलाव में योगदान के लिए प्रेरित किया।
सवाल उठते हैं तो जवाब आते हैं। समाधान मिलते हैं। कार्यशाला में सवालों का उठना इस बात का संकेत है कि आज के बच्चे अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को लेकर गंभीर हैं। विशेषज्ञों ने न केवल उनके सवालों को सराहा, बल्कि उनके असमंजस को भी दूर किया।
देवर्षि संत ने पूछा, खेल में लड़कियों की संख्या कम है, समाज भी उन्हें हतोत्साहित करता है। कैसे बदली जा सकती है लोगों की सोच?
विशेषज्ञ बोले : हमें कोशिश किसी की सोच बदलने की नहीं करनी। हमें एक ऐसा माहौल देना है कि लोग खुद सही गलत का फैसला कर सकें। लड़कियों को खुद को साबित करना होगा और आप बच्चों को ही अपने आसपास के लोगों को समझाना होगा, उनसे संवाद कायम करना होगा। ताकि वह हतोत्साहित करने वाली अपनी आदत बदल सकें।