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इनके लिए डॉक्टरी एक पेशा नहीं प्रार्थना का जरिया है, कायम की मिसाल, जानें- इनके बारे में

Mon, 04 Mar 2019 11:32 AM IST
ishwar ashish रोली खन्ना, अमर उजाला लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Mon, 04 Mar 2019 11:32 AM IST
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women who made their respectable place in medical field.
अपराजिता - फोटो : amar ujala
हयात ले के चलो कायनात ले के चलो, चलो तो सारे जमाने को साथ लेकर चलो।

डॉक्टरी उनके लिए महज एक पेशा नहीं। प्रार्थना का एक जरिया है। जब वे किसी मरीज की जिंदगी बचाने के लिए जूझ रही होती हैं, उस वक्त उनकी आस्था और यकीन भी दांव पर लगा होता है। मरीज व उसके परिवार के चेहरे पर दिखने वाली खुशी को ही वे अपनी प्रार्थना का परिणाम समझती हैं। समाज की सेहत का ख्याल रखते-रखते अक्सर वे खुद को भी पीछे छोड़ देती हैं। व्यक्तिगत योगदान से ऊपर उठकर उनकी टीम भावना भी काबिल-ए-तारीफ है। आइए, सलाम करते हैं ऐसी डॉक्टरों को... रोली खन्ना की रिपोर्ट
women who made their respectable place in medical field.
अपराजिता - फोटो : amar ujala
100 सालों का रिकॉर्ड तोड़ा, बनीं सर्जन
डॉ. गीतिका नंदा सिंह, सर्जरी डिपॉर्टमेँट, केजीएमयू।

डॉक्टर बनना तक तो सही था, लेकिन जब उन्होंने तय किया कि सर्जरी में जाऊंगी तो सब अवाक थे। मां तो इतनी डरी थीं कि कई दिनों तक रोती ही रहीं। लड़के वालों ने कहा कि सर्जन से शादी नहीं करनी, क्योंकि इसके पास घर के लिए समय ही नहीं रहेगा। यह कहानी है केजीएमयू की सर्जन डॉ. गीतिका नंदा की। डॉ. नंदा के मुताबिक, दरअसल लोगों की सोच गलत नहीं, सर्जरी फील्ड ही ऐसी है, जो डिमांडिंग मानी जाती है। यहां आपको 24 घंटे तैयार रहना पड़ता है। मौलाना आजाद लोकनायक हॉस्पिटल जब मैंने जॉइन किया तो वहां मुझे पहले स्वीकार ही नहीं किया। एक लड़की से गलती कभी स्वीकार नहीं की जाती है, पर थोड़ा वक्त लगता है। धीरे-धीरे आपकी इमेज बन जाती है, क्योंकि आपका काम बोलता है। बताती हैं कि केजीएमयू में आई, यहां 100 साल से सर्जरी में कोई महिला सर्जन नहीं थी। डॉक्टर गीतिका को एंडोस्कोपिक थायरॉइड सर्जरी और ब्रेस्ट आंकोप्लास्टी कंजर्वेेशन शुरू करने के लिए जाना जाता है।
हमारी सोच: परिपक्वता इसमें हैं कि आप महिला-पुरुष का भेद छोड़े और खुद को सिर्फ डॉक्टर समझें।
 
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अपराजिता - फोटो : amar ujala
इलाज के साथ तैयार कर रहीं नए डॉक्टर
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी की महिला विंग है क्वीन मेरी अस्पताल। पिछले 17-18 वर्षों में इसकी सूरत काफी बदल चुकी है। आईवीएफ व इनफर्टिलिटी यूनिट भी यहां है। लेप्रोस्कोपी व एंडोस्कोपी की सुविधा भी यहां मौजूद है। पहले यहां हर साल 3000 मरीज ही देखी जाती थीं, लेकिन अब यह आंकड़ा 10-11 हजार से ज्यादा मरीज तक  पहुंच चुका है। पूरे प्रदेश के साथ-साथ नेपाल तक की मरीज यहां आती हैं। यह सब संभव है एचओडी डॉ. विनीता दास, डॉ. एसपी जैसवार व  टीम की बदौलत। डॉ. विनीता दास कहती हैं कि इन्फ्रास्ट्रक्चर के हिसाब से हमने काफी कुछ हासिल किया है। पहले दो कमरे की ओपीडी थी, अब 14 कमरे हैं। हाल ही 100 बेड की एमसीएच शुरू हुई है। हमारी कोशिशों का नतीजा है कि स्टेट हेल्थ सिस्टम का खाका तैयार हुआ। हम टीचिंग की टेक्नोलॉजी को लगातार अपडेट करते हुए देश के लिए बेहतर महिला एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ तैयार कर रहे हैं। डॉ. जैसवार कहती हैं कि मरीजों को समर्पित यहां की हर वरिष्ठ डॉक्टर की अपनी एक अलग विशेषता है, जिसके लिए यूपी ही नहीं बल्कि देश-विदेश में भी उनका नाम है। इसके अलावा हमने साफ-सफाई व मरीजों को दी जाने वाली सुविधाओं को कई गुना बेहतर कर दिखाया है।

क्वीन मेरीः डॉ. सीमा मेहरोत्रा, डॉ. रेखा सचान, डॉ. उर्मिला सिंह, डॉ. विनीता दास, डॉ. एसपी जैसवार, डॉ. स्मृति अग्रवाल व डॉ. अंजु अग्रवाल।
हम यही कहेंगे: अपनी ड्यूटी ईमानदारी से पूरी करें।


 
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अपराजिता - फोटो : amar ujala
रोशन कर रहीं उम्मीद के चिराग
जीपीजीआई का मैटरनिटी रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट कई मायने में अनूठा। यहां से इलाज कराकर लौटे मरीजों से पूछिए तो कहते हैं कि यह जगह उनके लिए मंदिर से कम नहीं। निराश हो चुके कई लोगों के आंगन की किलकारियां यहां के डॉक्टरों की टीम की बदौलत है। विभाग की प्रमुख डॉ. मंदाकिनी प्रधान कहती हैं कि हम कुछ कर पाते हैं, क्योंकि हमारे साथ समर्पित और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम है। डॉ. नीता, डॉ. संगीता, डॉ. श्रुति जैन, डॉ. श्रुति, डॉ. सिद्धिदात्री, डॉ. इंदु, डॉ. अश्मिना, डॉ. गार्गी, डॉ. विभा, डॉ. लिपि व डॉ. भूमिका पूरी तरह से मरीजों के प्रति समर्पित हैं। यहां की विशेषज्ञ डॉक्टरों को तमाम जटिलताओं के बीच भी गर्भ में पल रहे भ्रूूण की जिन्दगी बचाने के लिए जाना जाता है। डॉ. मंदाकिनी को अपनी टीम पर गर्व है। कहती हैं कि  हमारी टीम एक दूसरे को पढ़ लेती है। भ्रूण में ब्लड ट्रांसफ्यूजन के दौरान मुझे बोलने की जरूरत नहीं पड़ती, उस वक्त एक-एक सेकंड महत्वपूर्ण होता है, ये लोग पल-पल के हिसाब से काम करती हैं। उनके डिसीजन पर मुझे भी शक नहीं होता। हाल ही में फॉग्सी की जेनेटिक एंड फीटल कमेटी की चेयरपर्सन बनीं डॉ. प्रधान बताती हैं कि हमारा तालमेल सिर्फ विभाग में ही नहीं, बल्कि अन्य विभागों के साथ भी बेहतर है। सीवीटीएस, इंडोक्राइन सर्जरी या अन्य। हम कोऑर्डिनेट कर बेहतर तरीके से काम करते हैं। विभाग की उपलब्धि के बारे में वे कहती हैं कि यहां से ट्रेंड डॉक्टर कई जगह अपना बेहतर दे रहे हैं और उन्हें विशेषज्ञ रूप में सभी ने स्वीकार किया है। हमने ही यहां पहली बार भ्रूण में ब्लड ट्रांसफ्यूजन शुरू किया। विश्व के सबसे छोटे भ्रूण में ट्रांसफ्यूजन का रिकॉर्ड भी इसी टीम के नाम है।
एसजीपीजीआई : मैटरनल रिप्रोडक्टिव हेल्थ डिपार्टमेंट
डॉ. मंदाकिनी प्रधान, डॉ. नीता, डॉ. संगीता, डॉ. श्रुति जैन, डॉ. श्रुति, डॉ. सिद्धिदात्री, डॉ. अश्मिना, डॉ. गार्गी, डॉ. विभा, डॉ. लिपि, डॉ. इंदु व डॉ. भूमिका।
ऐसा सोचते हैं हम: समर्पण काम के प्रति जरूरी है,खासकर जिस पेशे में हैं उसमें।


 
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अपराजिता - फोटो : amar ujala
क्वालिटी ट्रीटमेंट में अव्वल।
क्वालिटी ट्रीटमेंट हो या स्वच्छता अभियान के तहत कायाकल्प योजना, वे हर जगह आगे हैं। हर मानक पर खुद को खरा साबित किया। झलकारी बाई महिला अस्पताल क ी सीएमएस डॉ. सुधा वर्मा और डॉ. उर्मिला व डॉ. शिवानी की टीम ने साबित कर दिया कि यदि तय कर लें तो असंभव कुछ भी नहीं। डॉ. सुधा बताती हैं कि हमें एंट्री लेवल एक्रिडेशन मिल चुका है।हॉस्पिटल का नया इमरजेंसी कॉम्प्लेक्स तैयार करा रहे हैं। इमरजेंसी डिलीवरी की सुविधा भी हमारे यहां है। 82 बेड का यह अस्पताल शहर का ऐसा सरकारी अस्पताल है, जहां क्वालिटी पेशेंट ट्रीटमेंट का पूरा ध्यान रखा जाता है। इसीलिए हमें एनएबीएच सर्टिफिकेट मिला है और कायाकल्प में हम उत्तर प्रदेश में छठे स्थान पर हैं। लखनऊ के अस्पतालों में हमारा दूसरा स्थान है।

झलकारी बाई अस्पताल:  डॉ. सुधा वर्मा, डॉ. उर्मिला आर्य व डॉ. शिवानी सिंह
अपनी तो सोच यही है: महिलाएं हर क्षेत्र में आगे हैं और कहीं ज्यादा क्वालिटी ओरिएंटेड हैं।
हमारी ताकत: परस्पर समझ के साथ काम करना हमारी आदत है।


 
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