{"_id":"5c7a5068bdec22738d0b764b","slug":"women-who-changed-education-system","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"भावी पीढ़ी को आकार दे रहीं ये 'अपराजिता', डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया से बदल दी स्कूलों की तस्वीर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भावी पीढ़ी को आकार दे रहीं ये 'अपराजिता', डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया से बदल दी स्कूलों की तस्वीर
Sat, 02 Mar 2019 03:46 PM IST
ishwar ashish
रोली खन्ना, अमर उजाला लखनऊ
रोली खन्ना, अमर उजाला लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Sat, 02 Mar 2019 03:46 PM IST
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अपराजिता
- फोटो : amar ujala
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साहिल के सुकूं से किसे इनकार, लेकिन तूफान से लड़ने में मजा ही कुछ और है...
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सांख्यिकी की पहली महिला टीचर व विभाग प्रमुख
‘सशक्तीकरण बाहरी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती का नाम है। खुद को दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लायक बनाइए।’
लखनऊ विश्वविद्यालय के सांख्यिकी विभाग में पहली महिला फैकल्टी व हेड ऑफ डिपार्टमेंट बनीं। आमतौर पर साइंस पढ़ने का मतलब डॉक्टर या इंजीनियर बनना माना जाता है, लेकिन इन्होंने पूर्वाग्रह तोड़ दिए। गणित में अच्छी स्टूडेंट थीं। एक प्रोफेसर ने समझाया और उन्होंने सांख्यिकी चुन लिया। यहीं से तय हो गई जीवन की दिशा। डॉ. शीला मिश्रा ने लखनऊ विश्वविद्यालय से ही एमएससी किया और यहीं नियुक्ति हो गई।
महिला मुद्दों की पैरोकार
डॉ. शीला मिश्रा बताती हैं कि छात्र जीवन में बुनियादी जरूरतों के लिए हम लोगों ने विश्वविद्यालय में काफी संघर्ष किया। टॉयलेट तक नहीं थे। विभाग जॉइन करते ही सबसे पहले लेडीज टॉयलेट बनवाया। सांख्यिकी विभाग में पहली बार जेंडर सेंसटाइजेशन पर बात शुरू हुई। दो पेपर शुरू हुए जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में मील का पत्थर हैं, पहला, जेंडर स्टेटिस्टिक्स और दूसरा, बायो स्टेटिस्टिक्स। उत्तर भारत में लखनऊ विश्वविद्यालय एकमात्र विवि था, जहां ये विषय पढ़ाए जाने लगे और इसमें एमफिल व पीएचडी की डिग्री दी जाने लगी। खास बात है कि ये इलेक्टिव कैटेगरी होने के कारण अन्य विभागों के स्टूडेंट्स भी इसमें एडमिशन ले सकते हैं। डॉ. शीला के मुताबिक, उनके स्टूडेंट्स ‘ब्रिंगिंग द चेंज’ के कॉन्सेप्ट पर काम कर रहे हैं, जिसमें वे पढ़ाई, शोध के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में बराबर से हिस्सा लेते हैं।
‘सशक्तीकरण बाहरी नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती का नाम है। खुद को दुनिया की चुनौतियों का सामना करने के लायक बनाइए।’
लखनऊ विश्वविद्यालय के सांख्यिकी विभाग में पहली महिला फैकल्टी व हेड ऑफ डिपार्टमेंट बनीं। आमतौर पर साइंस पढ़ने का मतलब डॉक्टर या इंजीनियर बनना माना जाता है, लेकिन इन्होंने पूर्वाग्रह तोड़ दिए। गणित में अच्छी स्टूडेंट थीं। एक प्रोफेसर ने समझाया और उन्होंने सांख्यिकी चुन लिया। यहीं से तय हो गई जीवन की दिशा। डॉ. शीला मिश्रा ने लखनऊ विश्वविद्यालय से ही एमएससी किया और यहीं नियुक्ति हो गई।
महिला मुद्दों की पैरोकार
डॉ. शीला मिश्रा बताती हैं कि छात्र जीवन में बुनियादी जरूरतों के लिए हम लोगों ने विश्वविद्यालय में काफी संघर्ष किया। टॉयलेट तक नहीं थे। विभाग जॉइन करते ही सबसे पहले लेडीज टॉयलेट बनवाया। सांख्यिकी विभाग में पहली बार जेंडर सेंसटाइजेशन पर बात शुरू हुई। दो पेपर शुरू हुए जो महिला सशक्तीकरण की दिशा में मील का पत्थर हैं, पहला, जेंडर स्टेटिस्टिक्स और दूसरा, बायो स्टेटिस्टिक्स। उत्तर भारत में लखनऊ विश्वविद्यालय एकमात्र विवि था, जहां ये विषय पढ़ाए जाने लगे और इसमें एमफिल व पीएचडी की डिग्री दी जाने लगी। खास बात है कि ये इलेक्टिव कैटेगरी होने के कारण अन्य विभागों के स्टूडेंट्स भी इसमें एडमिशन ले सकते हैं। डॉ. शीला के मुताबिक, उनके स्टूडेंट्स ‘ब्रिंगिंग द चेंज’ के कॉन्सेप्ट पर काम कर रहे हैं, जिसमें वे पढ़ाई, शोध के साथ-साथ विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में बराबर से हिस्सा लेते हैं।
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सफर संघर्ष से सफलता तक
‘नकारात्मकता को खुद को छूकर गुजरने तक मत दीजिए। हर किसी के प्रति अपना नजरिया सकारात्मक रखिए, फिर देखिए बदलाव कैसे होते हैं।’
मुजफ्फरनगर में पैदाइश हुई थी। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी और सबसे लाडली। सबकुछ ठीक था, लेकिन अचानक से कुछ ऐसा हुआ जिसने इन्हें और मजबूत बना दिया। थक-हार कर निराश बैठने के बजाय इन्होंने तय कर लिया कि चलते जाना है। मंजिल की तलाश थी। इसी जद्दोजहद के बीच बड़े भाई के साथ मिलकर पिता द्वारा स्थापित पायनियर स्कूल संभाल लिया। आज लखनऊ और बाराबंकी में स्कूल की 19 शाखाएं संभाल रही हैं।
पिता के सपनों को दिए नए आयाम
पायनियर मॉन्टेसरी स्कूल की एल्डिको शाखा की प्रिंसिपल शर्मिला सिंह कहती हैं कि स्ट्रगल को जिस दिन हम एंजॉय करना सीख जाते हैं, चीजें खुद-ब-खुद आसान हो जाती हैं। लोग मनोरंजन के लिए घूमने या पिक्चर देखने चले जाते हैं, वहीं मुझे बच्चों के बीच रहना पसंद है। उनके चेहरे की खुशी देखकर सुकून मिलता है। जहां तक सवाल इतनी बड़ी स्कूल चेन को संभालने का है तो कहती हैं कि जब आप जिम्मेदारी से काम करना शुरू करते हैं तो मुश्किलें रास्ते से हट जाती हैं। मेरे साथ परिवार का भरपूर सहयोग रहा, इसलिए मेरे लिए चीजें उतनी कठिन नहीं रहीं।
‘नकारात्मकता को खुद को छूकर गुजरने तक मत दीजिए। हर किसी के प्रति अपना नजरिया सकारात्मक रखिए, फिर देखिए बदलाव कैसे होते हैं।’
मुजफ्फरनगर में पैदाइश हुई थी। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी और सबसे लाडली। सबकुछ ठीक था, लेकिन अचानक से कुछ ऐसा हुआ जिसने इन्हें और मजबूत बना दिया। थक-हार कर निराश बैठने के बजाय इन्होंने तय कर लिया कि चलते जाना है। मंजिल की तलाश थी। इसी जद्दोजहद के बीच बड़े भाई के साथ मिलकर पिता द्वारा स्थापित पायनियर स्कूल संभाल लिया। आज लखनऊ और बाराबंकी में स्कूल की 19 शाखाएं संभाल रही हैं।
पिता के सपनों को दिए नए आयाम
पायनियर मॉन्टेसरी स्कूल की एल्डिको शाखा की प्रिंसिपल शर्मिला सिंह कहती हैं कि स्ट्रगल को जिस दिन हम एंजॉय करना सीख जाते हैं, चीजें खुद-ब-खुद आसान हो जाती हैं। लोग मनोरंजन के लिए घूमने या पिक्चर देखने चले जाते हैं, वहीं मुझे बच्चों के बीच रहना पसंद है। उनके चेहरे की खुशी देखकर सुकून मिलता है। जहां तक सवाल इतनी बड़ी स्कूल चेन को संभालने का है तो कहती हैं कि जब आप जिम्मेदारी से काम करना शुरू करते हैं तो मुश्किलें रास्ते से हट जाती हैं। मेरे साथ परिवार का भरपूर सहयोग रहा, इसलिए मेरे लिए चीजें उतनी कठिन नहीं रहीं।
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बेटी ने मुझे पढ़ाया
‘बेटियों की शिक्षा आज भी एक चुनौती है। उनके प्रति दुर्भावाना दुख देती है। सोच बदलनी जरूरी है।’
बुंदेलखंड की रहने वाली हूं। चार बेटियां और एक बेटे की मां हूं। जिन्दगी में कभी-कभी ऐसा कुछ होता है जो आपको न केवल झकझोर देता है, बल्कि आपको बदल भी देता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरी एक बेटी महज 16 साल की उम्र में अनायास ही चल बसी। यह वही बेटी थी जिसने मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया था। उसने ही मेरा ग्रेजुएशन का फॉर्म भरवाया। उसके रहते ही मैंने डिग्री ले ली थी। फिर उसका निधन हो गया। उसके बाद मैंने पीजी किया। फिर पति का ट्रांसफर लखनऊ हुआ और हम यहां चले आए।
मैंने बेटियों को पढ़ाने का संकल्प लिया
लखनऊ आने के बाद मुझे अपनी तीनों बेटियों के एडमिशन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। काफी मुश्किलों से उनका एडमिशन करा सकी। एक तो बेटी की मौत से अंदर तक टूट चुकी थी, दूसरे बेटियों की पढ़ाई के लिए लंबा संघर्ष। संकल्प लिया कि बेटियों के लिए ऐसा स्कूल खोलना है, जहां उनको बेहतर शिक्षा मिल सके। इसी के बाद 1987 में सेंट जोसेफ स्कूल, राजाजीपुरम की नींव पड़ी। आज हमारी पांच शाखाएं हैं। काफी समय तक मैं स्कूल में एक्टिव रही, अब फाइनेंस डिपार्टमेंट देखती हूं। बाकी जिम्मेदारी बच्चों ने संभाल ली है।
‘बेटियों की शिक्षा आज भी एक चुनौती है। उनके प्रति दुर्भावाना दुख देती है। सोच बदलनी जरूरी है।’
बुंदेलखंड की रहने वाली हूं। चार बेटियां और एक बेटे की मां हूं। जिन्दगी में कभी-कभी ऐसा कुछ होता है जो आपको न केवल झकझोर देता है, बल्कि आपको बदल भी देता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मेरी एक बेटी महज 16 साल की उम्र में अनायास ही चल बसी। यह वही बेटी थी जिसने मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया था। उसने ही मेरा ग्रेजुएशन का फॉर्म भरवाया। उसके रहते ही मैंने डिग्री ले ली थी। फिर उसका निधन हो गया। उसके बाद मैंने पीजी किया। फिर पति का ट्रांसफर लखनऊ हुआ और हम यहां चले आए।
मैंने बेटियों को पढ़ाने का संकल्प लिया
लखनऊ आने के बाद मुझे अपनी तीनों बेटियों के एडमिशन के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। काफी मुश्किलों से उनका एडमिशन करा सकी। एक तो बेटी की मौत से अंदर तक टूट चुकी थी, दूसरे बेटियों की पढ़ाई के लिए लंबा संघर्ष। संकल्प लिया कि बेटियों के लिए ऐसा स्कूल खोलना है, जहां उनको बेहतर शिक्षा मिल सके। इसी के बाद 1987 में सेंट जोसेफ स्कूल, राजाजीपुरम की नींव पड़ी। आज हमारी पांच शाखाएं हैं। काफी समय तक मैं स्कूल में एक्टिव रही, अब फाइनेंस डिपार्टमेंट देखती हूं। बाकी जिम्मेदारी बच्चों ने संभाल ली है।
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एक सोच ने बदल दी स्कूलों की तस्वीर
रश्मि मिश्रा, अनिशा सिंह, सुरभि शर्मा, कल्पना लाल, प्रिया अरोड़ा, पारुल पाठक, नीलम मिश्रा, गीत त्रिवेदी, गीता वर्मा, प्रगति गुप्ता
बेसिक शिक्षा का स्तर काफी गिरा हुआ है। स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। यहां पढ़ने और पढ़ाने वालों का कोई भविष्य ही नहीं होता....। और भी न जाने कितनी ऐसी बातें सुनते-सुनते थक चुकी थी। एक दिन तय किया कि इस सोच को बदलना है। सरोजनीनगर ब्लॉक की एक टीचर रश्मि मिश्रा ने कोशिश शुरू की। पास के ही एक दूसरे स्कूल की टीचर अनिशा सिंह ने साथ दिया और मिलकर गांधी जयंती पर प्रतियोगिता का आयोजन किया। बच्चों व अभिभावकों दोनों को पसंद आया और इसी कोशिश का नतीजा है कि 800 स्कूल जुड़ चुके हैं।
...ताकि प्रतियोगिता के लिए तैयार हो सकें बच्चे
रश्मि व अनिशा बताती हैं कि कुछ स्कूल और जुड़े तो हमने अपने खर्च पर प्रतियोगिता का आयोजन शुरू किया। गांव वालों का बहुत सहयोग मिला, वे तख्त लगाकर मंच बना देते, घरों से चादर ले आते। धीरे-धीरे यह सिलसिला चल निकला। इस बीच हमने 350 प्रश्नों का एक बैंक तैयार किया। अब सरकारी आदेश के तहत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन हर साल किया जाता है। रश्मि के मुताबिक, बच्चों को प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करने की जरूरत है। हम उन्हें वैसे ही तैयार कर रहे हैं।
रश्मि मिश्रा, अनिशा सिंह, सुरभि शर्मा, कल्पना लाल, प्रिया अरोड़ा, पारुल पाठक, नीलम मिश्रा, गीत त्रिवेदी, गीता वर्मा, प्रगति गुप्ता
बेसिक शिक्षा का स्तर काफी गिरा हुआ है। स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती। यहां पढ़ने और पढ़ाने वालों का कोई भविष्य ही नहीं होता....। और भी न जाने कितनी ऐसी बातें सुनते-सुनते थक चुकी थी। एक दिन तय किया कि इस सोच को बदलना है। सरोजनीनगर ब्लॉक की एक टीचर रश्मि मिश्रा ने कोशिश शुरू की। पास के ही एक दूसरे स्कूल की टीचर अनिशा सिंह ने साथ दिया और मिलकर गांधी जयंती पर प्रतियोगिता का आयोजन किया। बच्चों व अभिभावकों दोनों को पसंद आया और इसी कोशिश का नतीजा है कि 800 स्कूल जुड़ चुके हैं।
...ताकि प्रतियोगिता के लिए तैयार हो सकें बच्चे
रश्मि व अनिशा बताती हैं कि कुछ स्कूल और जुड़े तो हमने अपने खर्च पर प्रतियोगिता का आयोजन शुरू किया। गांव वालों का बहुत सहयोग मिला, वे तख्त लगाकर मंच बना देते, घरों से चादर ले आते। धीरे-धीरे यह सिलसिला चल निकला। इस बीच हमने 350 प्रश्नों का एक बैंक तैयार किया। अब सरकारी आदेश के तहत प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन हर साल किया जाता है। रश्मि के मुताबिक, बच्चों को प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करने की जरूरत है। हम उन्हें वैसे ही तैयार कर रहे हैं।