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पढ़ें क्या था 'गेस्ट हाउस कांड', जो मायावती को गठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी आया याद
Sat, 12 Jan 2019 04:44 PM IST
शाहरुख खान
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: शाहरुख खान
Updated Sat, 12 Jan 2019 04:44 PM IST
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अखिलेश यादव और मायावती
- फोटो : अमर उजाला
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में परस्पर विरोधी बसपा (बहुजन समाज पार्टी ) और सपा (समाजवादी पार्टी) लोकसभा चुनाव में एक साथ मैदान में उतरेंगे। लखनऊ के एक होटल में बसपा सुप्रीमो मायावती व सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस कर इसकी घोषणा की। प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए मायावती शुरू से ही आक्रामक रहीं।
सपा और बसपा आए साथ
- फोटो : ANI
लखनऊ के चर्चित गेस्ट हाउस कांड को भूलकर दोनों दल 25 साल बाद एक बार फिर साथ हुए हैं, और आगामी लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ने का एलान किया है। इस दौरान मायावती लखनऊ गेस्ट हाउस कांड को नहीं भूलीं। उन्होंने ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि आज से 25 साल पहले भी सपा-बसपा के एक होने की कोशिशें हुई थीं। जिसका अंत गेस्ट हाउस कांड की घटना के रूप में हुआ। लेकिन देश व समाज के हित को देखते हुए हमने उस घटना को पीछे छोड़ दिया है।
बसपा सुप्रीमो मायावती व अखिलेश यादव।
- फोटो : amar ujala
भले ही भाजपा की तरफ से गठबंधन से लोकसभा चुनाव के गणित पर कोई फर्क न पड़ने के दावे किए जा रहे हों लेकिन जमीनी सच्चाई इसके ठीक उलट है। गठबंधन के बाद होने वाले चुनावी समीकरण और जातीय गणित भाजपा के चुनावी संघर्ष को 2014 के मुकाबले ज्यादा कांटे का बनाते दिख रहे हैं। हालांकि अखिलेश और मायावती के इस गठबंधन की अपनी भी चुनौतियां हैं लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि दोनों नेताओं ने इन चुनौतियों से पार पा लिया तो यह प्रयोग कम से कम उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनावी गणित को काफी प्रभावित करेगा।
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प्रेस कांफ्रेंस में बसपा सुप्रीमो मायावती व सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव।
- फोटो : amar ujala
वैसे तो सपा और बसपा 25 साल बाद एक साथ आ रहे हैं। पर, लोकसभा चुनाव में दोनों पहली बार गठबंधन करके भाजपा से लड़ेंगे। अयोध्या का विवादित ढांचा गिरने के बाद भाजपा की हवा रोकने के लिए सपा के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमो कांशीराम ने गठबंधन किया था। वैसे इस गठबंधन के पीछे 1991 में लोकसभा चुनाव के दौरान मुलायम और कांशीराम के बीच हुई दोस्ती की भी भूमिका थी। बहरहाल 1993 में बसपा का गठन हुए तब नौ वर्ष ही हुए थे। सपा तो नई-नई बनी थी। मुलायम सिंह यादव ने चंद्रशेखर से नाता तोड़कर समाजवादी पार्टी का गठन किया था।
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प्रेस कांफ्रेस करते अखिलेश यादव और मायावती
- फोटो : अमर उजाला
सपा ने 264 सीटों पर चुनाव लड़ा था और बसपा ने 164 सीटों पर। सपा को 109 सीटों पर जीत मिली जबकि बसपा को 67 पर। भाजपा को अकेले 177 सीटों पर जीत मिली थी। भाजपा की सीटों की संख्या सपा और बसपा को मिली सीटों से भी ज्यादा थी, पर चुनाव पूर्व गठबंधन के नाते तत्कालीन राज्यपाल ने गठबंधन के नेता मुलायम सिंह यादव को बुलाकर शपथ दिलाई। कांग्रेस ने इस गठबंधन का समर्थन किया। एक साल होते-होते महत्वाकांक्षाओं की टकराहट सार्वजनिक होने लगी और 2 जून 1995 को स्टेट गेस्ट हाउस कांड ने दोनों का गठबंधन तोड़ दिया और मुलायम सरकार गिर गई थी।