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यूपी में है भिखारियों का खास नेटवर्क, मनमाने तौर पर कहीं कोई नहीं जाता, लगाई जाती है ड्यूटी
Thu, 11 Feb 2021 05:13 PM IST
ishwar ashish
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: ishwar ashish
Updated Thu, 11 Feb 2021 05:13 PM IST
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लखनऊ में इंदिरा नगर में मुंशी पुलिया चौराहे पर बैठे भिखारी
- फोटो : अमर उजाला
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नेटवर्किंग का जिक्र छिड़ते ही हमारे जेहन में एक लोकप्रिय बिजनेस मॉड्यूल उभरता है। बिजनेस की बात छोड़ दें तो इस मॉडल की तमाम खूबियों को भिखारियों ने भी अपना लिया है। यही नहीं इससे वह अपनी चेन न केवल जिले में बल्कि अन्य जिलों और प्रदेशों में भी। कब कहां उर्स लग रहा है, महोत्सव लग रहा है सबकुछ उनके अंगुली के पोरों पर होता है। उनका अपना सूचना तंत्र है तो सुरक्षा, निगरानी और व्यवस्था के लिए भी पूरा सिस्टम बना है। यह सिस्टम पूरे अनुशासन के साथ चले इसके लिए हर बस्ती का दादा होता है। कौन कहां जाएगा, किस चौराहे पर जाएगा यह सब वही तय करता है। किस चौराहे पर ज्यादा भीख मिलती है, किस समय मंदिर पर भीख मांगना फायदेमंद है और कब रेड सिग्नल पर, इसका पूरा अध्ययन होता है।
प्रदेश भर में ऐसा नेटवर्क, फोन कॉल पर हो जाती है सारी व्यवस्थाएं
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- फोटो : अमर उजाला
हनुमान सेतु के बाहर केवलराम और भानमती भीख मांगते मिले। दोनों दुबग्गा बस्ती में रहते हैं। कुरेदने पर केवलराम ने बताया कि उसकी बस्ती से तीस लोग आगरा गए हैं, जिसमें उनका बेटा भी शामिल है। आगरा क्यों? इस सवाल पर वह बोल पड़ा- वहां विदेशी भीख में अच्छी रकम देते हैं। एक दिन में दो हजार रुपये तक भी मिल जाते हैं। तीन महीने तक भीख मांगने केबाद उसके बेटे वाली टोली वापस बस्ती लौट आएगी। उसकी बस्ती में इस समय लखीमपुर से आठ भिखारी आए हैं। साल भर में पचास-साठ भिखारी उसकी बस्ती में आते हैं और यहां से भी बड़ी संख्या में भिखारी बाहर जाते रहते हैं। ये आना-जाना लगा रहता है। सब कुछ बस्ती का बड़ा भिखारी तय करता है। जो भिखारी बाहर से आते हैं उनके लिए भी क्या कोई इंतजाम होते हैं? हां बिल्कुल। बड़ा भिखारी सब इंतजाम करता है। उनके रहने, भीख मांगने की जगह जाने केलिए ई-रिक्शा की व्यवस्था की जाती है। हम सब भी अपनी बस्ती से बाहर (अन्य जिलों या प्रदेश में) तब जाते हैं जब वहां के भिखारियों के मुखिया से फोन पर बात हो जाती है। जैसे हम यहां व्यवस्था करते हैं वैसे वहां हमें सुविधा मिलती है।
दादा रखता है हर जानकारी
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- फोटो : अमर उजाला
हमने जब भिखारियों के नेटवर्क की पड़ताल की दिशा में कदम बढ़ाया तो हमारी नजर मुंशी पुलिया चौराहे के पास सड़क किनारे बैठे एक भिखारी अस्मत अली पर पड़ी, वह महिला भिखारियों को कुछ समझा रहा था। गाड़ी उसके पास रोकी तो उसने हमारे आगे हाथ फैला दिया। भीख क्यों मांग रहे हो....? का करेन खाय पीये केर कउनो जुगाड़ नाहीं अहै। तो फिर यहां सड़क किनारे क्यों बैठा है, यहां तुझे कौन भीख देगा? इस बार भी जवाब तुरंत आया- पास केर मस्जिद मा नमाज होइ जाइ तो जाई, तबहीं सब भीख देइहैं। फिर महिलाओं की ओर इशारा कर बोला- तबले ई पंच हियां मंदिर मा कछु दुई चार पैसा मांग लेइहैं। अस्मत ने बताया कि वो डालीगंज रेलवे लाइन के कि नारे बसी भिखारियों की बस्ती में रहता है, अपने साथ दो-चार महिलाएं और बच्चोें का एक ग्रुप लेकर आया है। धार्मिक स्थलों पर पूजा-पाठ और नमाज की टाइमिंग के बारे में उसकी बस्ती का बूढ़ा भिखारी सब बता देता है। आने-जाने केलिए टैंपो या ई-रिक्शा भी दिया जाता है। इतना ही नहीं जिले भर के दूसरे स्थानों पर होने वाले हर आयोजन की जानकारी उसकी बस्ती के उस बूढ़े भिखारी (दादा) को रहती है। दादा को कैसे हर खबर रहती है, इस सवाल पर उसने कहा-डेरा बस्ती मा जउन भिखारी रहत अहैं, कुछ पूछै का होत है तो दादा उनते पूछ लेत हैं। यह कहते हुए अस्मत उठा और चलता बना। अस्मत की बात यह बताने केलिए काफी थी कि भिखारियों की हर बस्ती एक-दूसरे से कनेक्टेड है।
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उधार का बच्चा और सुरक्षा चक्र
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- फोटो : अमर उजाला
भिखारियों का नेटवर्क सिर्फ जगह ही तय नहीं करता है, बल्कि कौन किसके साथ भीख मांगने जाएगा और कैसे भीख मांगी जाएगी, ये भी तय करता है। ये बात अवध हॉस्पिटल चौराहा पर गोद में दुधमुंहा बच्चा लिए भीख मांग रही रामरती से पता चली। रामरती के साथ बूढ़ा भिखारी (उसकी बस्ती का दादा) रामनाथ और रामकली हैं। बातचीत में पता चला कि रामनाथ और रामकली उसपर नजर रखने के लिए आए हैं। नजर क्यो? इस सवाल का जवाब हमें रामनाथ से ही मिल सकता था। बहुत कुरेदने पर उसने बताया कि नजर इसलिए रखना जरूरी है ताकि कोई भाग न जाए। रामनाथ ने बताया कि वो सब डेरा बस्ती में रहते हैं। रामरती का पति तीन महीने से भीख मांगने अजमेर गया है। रामरती जिस बच्चे को गोद में ले रखी थी वह लावारिस मिला था। रामरती का पति कुछ दिन बाद अच्छी कमाई कर लौटेगा। बस्ती से अक्सर लोग बाहर जाते रहते हैं, यूपी और यूपी केबाहर भी। सब कुछ बस्ती में तय हो जाता है। हर महीने आठ दस लोग दूसरे जिलों में जाते हैं और दस से पंद्रह लोग बस्ती में भी आते हैं।
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प्रदेश के बाहर भी भिखारियों का है जबरदस्त को-आर्डिनेशन
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अब तक जितने भिखारियों से हमारी बात हुई उसका लब्बालुवाब यही है कि भिखारियों के नेटवर्क को पूरा पता रहता है कि किन महीनों में कहां ज्यादा पैसा मिलेगा। ख्वाजा गरीब नवाज का उर्स हो या फिर माघ मेला इनको हर प्रदेश में खास आयोजनों की पूरी जानकारी रहती है। यहां तक कि स्थानीय महोत्सवों की भी। कौन कहां जाएगा, उसके रहने, आने-जाने की व्यवस्था का पूरा नेटवर्क बना हुआ है। अगर कभी जिले या दूसरे प्रदेश में कोई मेला या महोत्सव लगता है तो वहां जाने केलिए बस्ती का दादा टोली तैयार करवा देता है। उन्हें सारी जानकारी रहती है। भिखारियों की बस्ती का दादा प्रदेश के बाहर के भिखारियों केदादा के लगातार संपर्क में रहता है। बातचीत में सामने आया कि लखनऊ से हर साल सौ-दौ सौ भिखारी इसी तरह अन्य प्रदेशों और जिलों में जाते हैं। कमोबेश यही आंकड़ा बाहर से यहां की बस्तियों में आने वाले भिखारियों का भी है। सदर की डेरा बस्ती, दुबग्गा, घैला, कुर्सी रोड, अलीगंज में बनी भिखारियों की बस्तियां इनकी पनाहगार बनती हैं।