राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन विद्वान, सिद्धांतवादी और धार्मिक विचारों के थे। नागरी प्रचारिणी सभा और हिंदी साहित्य सम्मेलन जैसी संस्थाओं की स्थापना भी उन्होंने ही की थी। वह काफी सरल थे। टंडन जी विधानसभा के अध्यक्ष थे। वरिष्ठ साहित्यकार श्रीनारायण चतुर्वेदी को वह अक्सर बुला लेते। एक दिन चतुर्वेदी राजर्षि टंडन से मिलने जाने की तैयारी कर रहे थे कि महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला आ पहुंचे।
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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
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चतुर्वेदी जी ने उन्हें प्रणाम किया और बैठाया। निराला जी को पता चला कि चतुर्वेदी जी विधानसभा अध्यक्ष टंडन के यहां जा रहे हैं तो बोले, ‘मैं भी चलूंगा।’ चतुर्वेदी जी टंडन को ‘बाबू जी’ कहते थे। चतुर्वेदी ने संस्मरण में लिखा है, ‘ मैं निराला जी को टाल नहीं सका और उन्हें लेकर बाबू जी के यहां पहुंचा। जलपान के बाद निराला जी अपने सहज स्वभाव में आ गए।
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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
बाबू जी से बोले, ‘मैं आपको अपनी कुछ कविताएं सुनाऊंगा।’ उत्तर सुने बिना वहां पड़े एक लंबे सोफे पर एक किनारे बैठ गए और दूसरे कोने पर बाबू जी को बैठने को कहा। मैं सामने कुर्सी पर बैठा। निराला जी ने एक लंबी कविता बड़ी मौज से सुनाई। फिर एक दूसरी कविता सुना डाली। निराला जी की कविता सुनाने की शैली तो थी ही अजीब।
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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
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बाबू जी जैसे आदमी को उसमें क्या मजा आता। अलबत्ता निराला के अंदाज पर मुझे जरूर मजा आ रहा था। कविताएं अतुकांत और गंभीर छायावादी थीं। भाषा भी क्लिष्ट। दाद देना दूर बाबू जी सिर झुकाए बैठे थे। उन्होंने दिखावे के लिए भी सिर नहीं हिलाया। निराला जी कहां लंबे समय तक चुप्पी बरदाश्त करते।
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सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
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बाबू जी को तेज स्वर में डांटने जैसे अंदाज में बोले, ‘कुछ समझ में भी आ रहा है?’ बाबू जी विनम्र भाव से बोले, ‘समझने का प्रयत्न तो कर रहा हूं।’ यह कहना था कि निराला जी और उग्र हो गए। मैं निराला जी को जैसे-तैसे समझाकर साथ लेकर बाहर आया। लग रहा था कि बाबू जी भी नाराज होंगे परंतु वह कार तक छोड़ने आए। निराला जी गाड़ी में बैठे तो बड़ी विनम्रता से कमर तक झुकते हुए उन्हें प्रणाम भी किया।