अटल बिहारी वाजपेयी बडे़ दिल के भी थे। एक वक्त उनकी सांसदी पर भी आ पड़ी, लेकिन तब भी उन्होंने इसके बजाय उत्तर प्रदेश में चल रही भाजपा की तत्कालीन सरकार बचाने को वरीयता दी। तब विधानसभा अध्यक्ष और अब पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी बताते हैं, ‘इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अटल के निर्वाचन को चुनौती देते हुए याचिका दायर हुई।
उन्होंने फोन पर कहा, ‘शिवकुमारजी के हाथ याचिका की प्रति परामर्श के लिए भेज रहा हूं।’ याचिका देखी तो उसमें उठाया एक बिंदु महत्वपूर्ण था, जिस पर यह स्वीकृत हो सकती थी।
मुझे चिंता हुई। दिल्ली जाकर उनसे मिला। कहा, ‘बिंदु महत्वपूर्ण है। पर, मुझे एक तर्क से यह कटता दिख रहा है। चाहता हूं कि खुद बहस करूं। विस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर बहस करने की अनुमति चाहता हूं।’ अटलजी बोले, ‘मेरी सांसदी रहे या न रहे, लेकिन उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार चलना जरूरी है।
कोई अन्य वकील हो तो बताओ।’ बकौल केशरी, ‘मैंने एक वरिष्ठतम अधिवक्ता से बात की। उन्होंने भी कहा याचिका निरस्त होना बहुत मुश्किल है। प्रयास पर बहस को तैयार हुए लेकिन निर्धारित तारीख पर पता नहीं क्यों न्यायालय ही नहीं गए।
मुझे लगा इससे तो और गड़बड़ हो जाएगी। मैंने फिर अटल जी से त्यागपत्र की अनुमति मांगी, पर उन्होंने इजाजत नहीं दी। आखिरकार मैंने अपनी पसंद के वकील से बहस कराई। जैसे-तैसे याचिका निरस्त हुई।