एक दौर था जब लोग मुल्क के किसी भी हिस्से में इल्म और तालीम की बात करते थे तो लखनऊ का जिक्र जरूर आता था। इसमें कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज भी शुमार था। बेहद हसीन और खुशगवार अतीत वाला ये कॉलेज आज शहर के प्रमुख स्कूलों में से एक है। अमर उजाला ने कॉलेज प्रिंसिपल, कुछ इतिहासकारों से बात कर जाना कॉलेज के वैभवशाली इतिहास के बारे में, पेश है रिपोर्ट...
लखनऊः खूबसूरत यादें संजोए है कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज, जावेद अख्तर का है खास नाता
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इसमें पढ़ने वाले बच्चों की संख्या भी बहुत ज्यादा नहीं सिर्फ 50 के आसपास ही रहती थी। जिस वर्ष इस की छात्र संख्या ने 100 का आंकड़ा छुआ उस दिन मारे खुशी के विद्यालय में एक दिन का अवकाश घोषित किया गया। राजघराने का पाल्य होने की शर्त को 1933 में हटा लिया गया। 1945 में कॉलेज में इंटरमीडिएट तक की शिक्षा आरंभ की गई। 1965 में इस विद्यालय को भारत सरकार द्वारा देश के प्रमुख विद्यालयों के रूप में चिह्नित करते हुए मेधावी छात्रों को शिक्षित करने के लिए अधिसूचित किया गया।
कॉलेज के बारे में
कॉलेज आंशिक रूप से आवासीय है। इसमें दो बोर्डिंग हाउस अवध और अंजुमन हैं, जिसमें 150 छात्र बैठ सकते हैं। वर्तमान में कॉलेज इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट परीक्षा नई दिल्ली से संबद्ध है। दूसरे स्कूलों की तरह यहां भी हाउस सिस्टम है। स्कूल में पांच हाउस अजंता, नालंदा, सांची, तक्षशिला और उज्जैन हैं। इस स्कूल में वार्षिक खेल दिवस और पुराने छात्रों के मिलने के लिए एक दिन तय होता है, जो दिसंबर में ‘दरबार डे’ के नाम से मनाया जाता है।
लखनऊ को अपने दिल में समेटे फिल्मी जगत के गीतकार, लेखक जावेद अख्तर अपनी आत्मकथा में इस कॉलेज का जिक्र करते हैं। वे लिखते हैं ‘मेरा दाखिला लखनऊ के मशहूर स्कूल कॉल्विन ताल्लुकेदार में छठीं क्लास में करा दिया जाता है। पहले यहां सिर्फ ताल्लुकेदारों के बेटे पढ़ सकते थे अब मेरे जैसे कमजातों को भी दाखिला मिल जाता है। अब भी बहुत महंगा स्कूल है, मेरी फीस 17 रुपये महीना है। मेरी क्लास में कई बच्चे घड़ी बांधते हैं। वो सब बहुत अमीर घरों के हैं। उनके पास अच्छे-अच्छे स्वेटर हैं। एक के पास फाउंटेन पेन भी है। ये बच्चे इंटरवल में स्कूल की कैंटीन में आठ आने की चॉकलेट खरीदते हैं। अब मुझे भगवती की चाट अच्छी नहीं लगती। कल क्लास में राकेश कह रहा था कि उसके डैडी ने कहा है कि उसे पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजेंगे। कल मेरे नाना कह रहे थे, अरे कमबख्त! मैट्रिक पास कर ले तो किसी डाकखाने में मोहर लगाने की नौकरी तो मिल जाएगी। इस उम्र में जब बच्चे इंजन ड्राइवर बनने का ख्वाब देखते हैं मैंने फैसला कर लिया कि बड़ा होकर अमीर बनूंगा।