लखनऊ में संगीत के ऐसे शिक्षक और गुरु हैं जो भारत में रहकर विदेशी छात्रों की पहली पसंद बने हुए हैं। फ्रांस, रूस, श्रीलंका के युवा उनसे न सिर्फ संगीत सीखने आते हैं बल्कि उनके साथ रहकर संगीत की साधना करते हैं और अपने देश जाकर भारतीय संगीत और नृत्य की शिक्षा दे रहे हैं। कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जो लखनऊ में सीखी कला से लंदन तक महका रहे हैं। शहर के कुछ ऐसे ही गुरुओं और विदेशी शिष्यों की जुगलबंदी पर एक खबर...।
विदेशी शिष्यों की पहली पसंद बने लखनवी गुरु, लखनऊ में सीखी कला से महका रहे हैं लंदन तक
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लखनऊ घराने के गायक यशभारती अवार्डी उस्ताद गुलशन भारती से गायन सीखने के लिए जापान, फ्रांस से भी लोग आते रहे हैं। उस्ताद ने बताया कि कई सालों पहले यूकिओ ओहाशी उनसे संगीत गायन सीखने आये। कुछ समय पहले फ्रांस के जूलियन ने भी गायन सीखा। अब तकनीक का दौर हो चला है तो इन दिनों लंदन वासी अनुराधा चतुर्वेदी समेत कई लोग उनसे आनलाइन गायन सीख रहे हैं।
भातखंडे संगीत विवि से तबला शिक्षक पद से सेवानिवृत्त पं. रविनाथ मिश्रा के पास तबला सीखने आई मास्को की हन्ना पास्केविच तबले के साथ हिंदी बोलना और खाना पकाना भी सीख गई। पं. रविनाथ मिश्र बताते हैं कि काफी पड़ताल कर वो यहां संगीत की शिक्षा के लिये तबला सीखना उसका जुनून था। 2013, 14, 15 तक उसने मेरी निगरानी में रहकर तबला वादन सीखा। हॉस्टल की बजाय प्राइवेट फ्लैट लेकर रहती थी। संस्थान के अलावा अक्सर घर चली आती तो तबला के अलावा परिवार वालों से मिलकर और भी बहुत कुछ सीखती। चंद महीनों में हिंदी समझना, बोलना सीख गई तो वेज खाने की शौकीन हो गई और खाना पकाना भी धीरे-धीरे सीखने लगी। भातखंडे के वादन-गायन संगीत शिक्षक डॉ. कमलेश दुबे की निगरानी में कैलिफोर्निया की आना ने पखावज, यूरोप से मेरोथ, श्रीलंका की वादन छात्रा इंशिका ने वाद्यवृंद की बारीकियां सीखीं।
तीन साल तक डैनियल ने घर में रहकर सीखा पखावज
नगर के चर्चित पखावज वादक पं. राज खुशीराम के घर फ्रांस के डेनियल डेंजस ने तीन साल से अधिक समय तक रहकर पखावज वादन सीखा। पं. राज खुशीराम ने बताया कि बात 12-15 साल पुरानी है। वे बनारस में ध्रुपद मेले में जाया करते थे, जहां डेनियल संस्कृत में शोध कर रही अपनी मां के साथ रहते थे। एक दिन वो मेरे पास आये और कहा कि पखावज वादन सीखना है। मैंने कहा कि पखावज वादन के लिए लखनऊ में आकर सीखना होगा, तो वो लोग घर आ गए। मैंने उसे गंडा बांधा, शिष्य बनाया वो उसके बाद लगातार तीन साल तक मेरे साथ ही रहकर वादन सीखता रहा, कई बड़े अवसरों पर मेरे साथ मंच साझा किया। फ्रांस की सरकार ने उसे स्कॉलरशिप भी दी। फुर्सत मिलने पर हम साथ खूब लखनऊ घूमते, जायके चखते, वो पूरा शाकाहारी भोजन की करता। फ्रांस वापसी से पहले तक उसे साफ भोजपुरी, बनारसी बोली, हिंदी बोलना आ चुकी थी। मुझे कई बार फ्रांस भ्रमण के लिए बुलाया, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से नहीं जा सका।
70 के दशक में आगरा से लखनऊ भ्रमण के दौरान 7-8 साल की उम्र में कथकाचार्य पं. लच्छू महाराज के सामने कथक नृत्य से वाहवाही पाई। उसके बाद उनकी शिष्या बनीं वरिष्ठ कथक काजल शर्मा अब दो दशकों से विदेशी छात्रों को कथक सिखा रही हैं। मैनचेस्टर के वेदिक ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडियन कल्चर एंड एजुकेशन में पढ़ाने के अलावा नॉर्थ वेल्स में इस दौरान लगभग दो हजार से अधिक छात्रों को कथक सिखा चुकी हूं। कई नृत्य प्रतियोगिताओं में दुबई, स्पेन, यूएसए में भी अक्सर कथक शिक्षा, प्रतियोगिता की निर्णायक के लिए आमंत्रित किया जा चुका है। उप्र संगीत नाटक अकादमी से अकादमी अवार्डी लखनऊ घराने की कथक नृत्यांगना काजल शर्मा ने बताया कि गुरु जी ने घरवालों से कथक सीखने को कहा तो उसके बाद उनसे काफी समय तक लखनऊ में कथक सीखने के बाद गुरु पं. बिरजू महाराज जी से लंबे समय तक कथक सीखा। अब पिछले 25-26 सालों से इंग्लैंड में रहकर कथक की शिक्षा वहां के छात्रों को दे रही हूं। विदेशी छात्राओं में नृत्य की इस विधा के लिए काफी उत्सुकता है, ये देख अच्छा लगता है क्योंकि किसी न किसी मायने में भारत की संस्कृति, लखनऊ घराने का कथक लंदन में धूम तो मचा रहा है।