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महिला दिवस विशेष: कम उम्र में विवाह, फिर घरेलू हिंसा और एसिड अटैक तक... पर टूटा नहीं हौसला

Thu, 04 Mar 2021 02:07 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Thu, 04 Mar 2021 02:07 PM IST
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Special story series for International Women's Day.
मीना सोनी। - फोटो : amar ujala

‘मेरी मंजिल मेरे करीब है, इसका मुझे अहसास है, गुमां नहीं मुझे इरादों पर अपने, ये मेरी सोच और हौसलों का विश्वास है...’।  जोश से भरे इन शब्दों के साथ आइए शुरुआत करते हैं अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के जश्न की। जश्न के साथ ही बात करते हैं उन जरूरी मुद्दों की, जो आज भी चिंता का कारण हैं और इस बात की ताकीद करते हैं कि अभी बेटियों के हक में प्रयासों की जरूरत बाकी है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस सप्ताह में हम कुछ जरूरी मुद्दों की ओर ध्यान दिलाने के लिए एक विशेष शृंखला शुरू कर रहे हैं। आज की इस पहली कड़ी में हम बात करेंगे बाल विवाह की पीड़ा में तप कर कुंदन बनी महिलाओं और इस समस्या के खिलाफ जंग लड़ रहे युवा योद्धाओं की...। एक रिपोर्ट:

Special story series for International Women's Day.
मीना सोनी। - फोटो : amar ujala

कम उम्र में विवाह, फिर घरेलू हिंसा और एसिड अटैक तक... पर टूटा नहीं हौसला
मेरा नाम मीना सोनी है। मैं दो बेटियों और एक बेटे की मां हूं और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र से जुड़ी हूं और नैमतखाना में बतौर मैनेजर काम करती हूं। साथ ही समाज की उपेक्षित और कुरीतियां झेल रही महिलाओं के लिए काम करती हूं।

बात उन दिनों की है जब मैंने हाईस्कूल पास किया था। उम्र 16 साल थी। गोसाईंगंज में मेरा परिवार रहता था। एक दिन अचानक मेरी शादी का फैसला हो गया और मैं ब्याह कर ससुराल चली आई, जहां मेरा परिचय घरेलू हिंसा से हुआ। तीन बच्चों की मां बनी, पति ज्यादार बाहर रहते थे। परिवार को आर्थिक मजबूती देने के लिए मैंने नौकरी शुरू की और इसी के साथ मुझ पर शक बढ़ा। एक दिन मैं सो रही थी कि पति ने मेरे चेहरे पर एसिड फेंक दिया। मेरी दुनिया उस दिन से पूरी बदल गई, मैं तड़पती हुई घर से बाहर भागी, उधर पति ने एसिड डालने के बाद अपनी जान दे दी। एक लंबा वक्त मेरा इलाज चला, मेरे भाइयों ने मेरा साथ दिया।

शीशा देखती हूं तो लगता कि मुझे मर जाना चाहिए, पर बेटियों व बेटे का मुंह देख कर जीने की हिम्मत आ जाती। हां, इतना जरूर था कि मैं सोचती हूं कि मेरी शादी कम उम्र में नहीं होती तो शायद मैं अपने पैर पर खड़ी हो चुकी होती और फिर खुद पर हुए अत्याचार का विरोध कर पाती। सद्भावना ट्रस्ट से जुड़ने के बाद मुझे जीने की राह मिली और आज मैं अपनी पहचान बनाकर अपने बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना देख रही हूं। रेस्टोरेंट में नौकरी जीविकोपार्जन का जरिया है, लेकिन मैं मुश्किलों में पड़ी महिलाओं को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराती हूं।

Special story series for International Women's Day.
टीम चाइल्ड लाइन। - फोटो : amar ujala

बदलाव को तैयार युवा योद्धाओं की टोलियां
एक तरफ तमाम कवायदों के बीच बाल विवाह जैसी समस्याएं बेटियों के आगे बढ़ने की राह को रोक रही हैं तो दूसरी ओर राजधानी के युवा योद्धाओं की टोलियां सिर उठाती इस समस्या को जड़ से खत्म करने का संकल्प ले चुकी है। आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही युवा प्रयासों के बारे में।

बाल विवाह की कुरीतियों का दंश घर के आसपास, घर में हमने महसूस किया है। तब लगा कि बाहर यह समस्या कितनी बड़ी होगी। बस इसी सोच के साथ हम चाइल्ड लाइन से जुड़े और पूरी टीम बीते साल से अब तक 53 बाल विवाह रुकवा चुकी है। टीम की सदस्य काजल पांडेय कहती हैं कि हमारे गांव में परिवार की एक बेटी का विवाह हमने रुकवाया था, तब से यह सिलसिला जारी है। रही बात बाल विवाह रुकवाने के दौरान आने वाली मुश्किलों की तो टीम का साथ और सीडब्ल्यूसी सदस्य डॉ. संगीता शर्मा व अन्य के सहयोग से हम मुश्किलें हल कर लेते हैं। खास है कि हमारी टीम में किसी ने एलएलबी किया है तो किसी ने एमएसडब्ल्यू।

टीम चाइल्ड लाइन ने रुकवाई 53 बच्चियों की शादियां
महिला सदस्य : काजल पांडेय, तेजस्वी शर्मा, ट्विंकल सिंह, ज्योत्सना मिश्रा, तनु व अन्य
पुरुष सदस्य : कृष्णा, विजय, नवीन, बृजेंद्र व अन्य।

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टीम वाल्सल्य। - फोटो : amar ujala

टीम वात्सल्य ने अब तक रोके 32 बाल विवाह
टीम की महिला सदस्य : वैशाली, शोभिका, सविता, अर्चना, प्रीति
अन्य सहयोगी : गौरव, विवेक, धर्मेंद्र, अंजनि, सौरभ, भूपेंद्र अवधेश, रवि, प्रेमशंकर, प्रशांत, राजकमल, योगेंद्र व अन्य।

किसी ने स्नातक की डिग्री ली तो कोई पीजी करके आगे की तैयारी कर रहा है। पढ़ाई और घर की देखभाल तो प्राथमिकता है ही, पर इसके साथ हमारे आसपास जो भी गलत हो रहा है उसे रोकना भी हमारी जिम्मेदारी है। इसी सोच के साथ आगे बढ़ रही है टीम वात्सल्य, जिसने अब तक 32 बाल विवाह होने से रोके हैं। हालांकि ये लोग स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, भागीदारी व अन्य कई मुद्दों पर भी काम कर रहे हैं। टीम की महिला सदस्य कहती हैं कि हम सभी मिलकर काम करते हैं। समस्या या शिकायत सामने आने पर बातचीत व काउंसिलिंग से हल निकालने की कोशिश के लिए दिन-रात एक कर देते हैं। यदि कोई जिद पर अड़ जाता है तो हम सीडब्ल्यूसी सदस्य सुधा रानी को फोन कर मदद लेते हैं। पहले हमारी टीम में दो लड़कियां थीं, धीरे-धीरे संख्या बढ़ रही है।

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चाइल्ड प्रोटक्शन स्पेशलिस्ट, यूनिसेफ के आफताब मोहम्मद - फोटो : amar ujala

हिंसा के चक्र को तोड़ना होगा
चाइल्ड प्रोटक्शन स्पेशलिस्ट, यूनिसेफ के आफताब मोहम्मद का कहना है कि बाल विवाह मानवाधिकार का हनन है, यह बच्चों का बचपन छीन लेता है, जो कि कानूनन जुर्म है। बच्चियां इससे हिंसा के चक्रव्यूह में भी उलझ जाती है और नतीजा कुपोषण व मृत्यु तक का शिकार होती है। यदि इसे रोकना है तो सरकार, सामाजिक संगठन व अन्य एजेंसियों को साथ आना होगा और मिलकर बच्चों के सपनों को उड़ने का हौसला देना होगा।

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