कोरोना काल के दौरान वर्क फ्रॉम होम ने जहां काम करने वालों को घर में रहने का मौका दिया, वहीं घर के बुजुर्गों का चैन भी छीन लिया। हालात यहां तक पहुंच गए कि बुजुर्ग खांसने से भी डरने लगे। आश्रित बुजुर्गों ने सबसे अधिक अपनों की प्रताड़ना अप्रैल और मई के महीनों में झेली। गाइड संस्था के तीनों हेल्पलाइन नंबरों में से एक नंबर पर आने वाले फोन कॉल का ब्यौरा देखें तो अकेले अप्रैल में 353 और मई में 242 फोन कॉल आए। इनमें से 99 फीसदी शिकायतें गोंडा, बहराइच, कानपुर और लखनऊ के लोगों से जुड़ी हैं जबकि लखनऊ की 60 प्रतिशत शिकायतें हैं।
Special Story: वर्क फ्रॉम होम ने छीना बुजुर्गों का चैन, दोबारा चाय मांगी तो बहू ने पलट दिया फ्रिज...
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केस-2: लॉकडाउन में घर के काम के लिए मां को बुलाया, किया नजरबंद
गोमतीनगर में रहने वाली मां को उनका बड़ा अधिकारी बेटा जबरदस्ती दूसरे शहर ले गया। घर में काम वाला कोई आ नहीं रहा था, पति-पत्नी दोनों को दिक्कत हो रही थी। मां ने हेल्पलाइन को फोन कर मदद मांगी तो उन्हें दूसरे शहर से रेस्क्यू कर लखनऊ लाया गया।
युवाओं को पहल करनी होगी, वरना कोई नहीं समझेगा
गाइड समाज कल्याण संस्थान की संस्थापक और एमडी डॉक्टर इंदु सुभाष कहती हैं कि वृद्धजनों से दुर्व्यवहार लगातार बढ़ता जा रहा है, यह चिंतनीय है। जरूरत है कि युवा पीढ़ी में ऐसे संस्कार विकसित किए जाएं जो बुजुर्गों को समझ सके।
यूथ ब्रिगेड ने संभाला मोर्चा, सीखें और सिखाएंगे बुजुर्गों के साथ कैसे करें व्यवहार
अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस पर गाइड समाज कल्याण संस्थान की पहल पर गोल्डन एज हेल्प मूवमेंट के तहत विभिन्न विश्वविद्यालयों के 300 युवाओं ने आगे आकर बुजुर्गों के लिए काम करने की हामी भरी है। इसके तहत ये युवा बुजुर्गों की जरूरतों को पूरा करने के साथ पेश आने के तरीकों और लोगों को कैसे वृद्धों के प्रति संवेदनशील बनाएं इस बारे में सीखेंगे। प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हो चुका है, इसके तहत युवा वृद्धजनों को कानूनी परामर्श देने, चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने, उनके शौक को एक नई दिशा देने और दादा-दादी क्लब के जरिए उनसे संवाद बनाए रखने का पाठ पढ़ रहे हैं।
युवा टीम की कमान शाश्वत के हाथ
लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र शाश्वत बताते हैं कि कोरोना काल में सबसे बड़ी जरूरत बुजुर्गों का अकेलापन दूर करने की महसूस की गई। इसलिए हमने ई-लिटरेसी कैंपेन बुजुर्गों के लिए चलाया है। इसके तहत हम उन्हें मोबाइल चलाना, नेट सर्फिंग सिखा रहे हैं। शाश्वत कहते हैं कि हमने जब बुजुर्गों से बात की तो उन्होंने बताया कि इन दिनों न बाहर जा सकते हैं न ही ज्यादा लोगों के बीच में रह सकते हैं। उन्होंने खुद को व्यस्त रखने का जरिया पूछा। इस पर जब उनसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खुद को सक्रिय करने की सलाह दी तो उन्होंने कहा कि फोन हम खरीद लेंगे, पर हमें इसका इस्तेमाल सिखा दे। हमारी टीम ने उन्हें ई-लिटरेसी के लिए तैयार किया। हमारी कोशिशों का नतीजा ये हुआ कि अब ये बुजुर्ग वेबिनार कर सकते हैं, म्यूजिक रिकॉर्ड कर लेते हैं।
छह साल से बुजुर्गों के हक में खड़ी हैं आय़ुषी
आयुषी अवस्थी ने हाल ही में 12वीं पास की है। कहती हैं कि छह साल से उन लोगों के बीच हूं जो बुजुर्गों के लिए काम कर रहे हैं। आयुषी कहती हैं कि हम कुछ नहीं करते बस बुजुर्गों से बात करते हैं, उनको सुनते हैं। वे गोल्डन एज हेल्प मूवमेंट में सोशल मीडिया मैनेजर हैं।