रोज-रोज गिरकर भी मुकम्मल खड़ी हूं, ऐ मुश्किलों, देखो तुमसे कितनी बड़ी हूं मैं...। हर शब्द उनके साहस की कहानी कहता है। दर्द देकर उन्हें हराने की कोशिशें उन्होंने अपने धैर्य से नाकाम कर दी। अपने आंसुओं को अपनी ताकत बनाया। हार न मानने का इरादा लेकर वे आगे बढ़ीं, नतीजा वे अपने बेहतर भविष्य को लेकर आगे बढ़ रही हैं। इतना ही नहीं इनमें से कुछ ने तो घरेलू हिंसा को खत्म करने की मुहिम छेड़ दी है। महिला दिवस पर बाधाओं को हराने वाली ऐसी अपराजिताओं को ‘अमर उजाला’ सलाम करता है। आज की इस कड़ी में हम बात करेंगे घरेलू हिंसा के खिलाफ खड़ी हुईं उन महिलाओं की जो अपने साथ दूसरों के लिए एक ताकत बनी हुई हैं। रोली खन्ना की रिपोर्ट...।
महिला दिवस पर स्पेशल स्टोरी: आगे बढ़ना चाहती थी... पर पीटी जाती रही... अब करनी है कानून की पढ़ाई
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आगे बढ़ना चाहती थी... पर पीटी जाती रही... अब करनी है कानून की पढ़ाई
मेरा नाम ज्योति सिंह है। करीब आठ साल पहले मेरी शादी हुई थी, उस वक्त में 20 साल की थी। आम लड़की की तरह शादी को लेकर मेरे अपने सपने थे, सोच थी। ससुराल जाने के साथ ही लगा कि बुरा सपना देख रही जो सच हो गया। गाली-गलौज, मारपीट, तानों से मुझे तोड़ने की कोशिश की जाने लगी। मेरी गलती बस इतनी थी कि मैं चुप रहती थी और मुझे आगे बढ़ना था। देखते ही देखते मेरा घर से निकलना, मुझे मां के घर भेजना बंद कर दिया गया। भाई की शादी में मुझे जबरदस्ती लेकर गए मेरे भाई। आठ साल की शादी में बस डेढ़ महीने तक ससुराल में रही। हर बात में मुझे धमकी दी जाने लगी। एसिड अटैक तक की धमकी दे डाली, उन धमकियों से मैं इस कदर सहमी कि आज भी कोर्ट में उसकी शक्ल देखकर डर जाती हूं।
चार साल तक इंतजार किया... पर अब और नहीं
मायके चली तो आई, लेकिन माता-पिता ने कहा कि इंतजार करो। चार साल तक सब ठीक होने का इंतजार किया। इसके बाद धैर्य जवाब दे दिया। अपने केस के सिलसिले में आली संगठन के संपर्क में आई, तो हौसला मिला। मैं अपना केस लड़ रही हूं। एलएलबी करना चाहती हूं, खुद को आत्मनिर्भर बनाना चाहती हूं। कानून की पढ़ाई मेरा लक्ष्य है, थोड़ा पैसा जुटा लूं फिर आगे की पढ़ाई करूंगी।
हक की लड़ाई को धार दे रही नई टीम
एडवा, आली, 181 वन स्टाफ सेंटर जैसे मजबूत संगठन नई टीम के साथ और ज्यादा मजबूत हो रहे है। नई ऊर्जा, नए उत्साह के साथ महिला हिंसा के खिलाफ इनकी कोशिशें और तेज हो गई हैं। नई टीम की नई कोशिशों को शुभकामनाओं के साथ आइए जानते हैं उनके बारे में।
सोशल मीडिया से लेकर जमीनी लड़ाई के लिए तैयार
महिला अधिकारों की बुलंद आवाज अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (एडवा) की युवा टीम भी पुरानी टीम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हो गई है। इनमें दीप्ति मिश्रा जहां एडवा का सोशल मीडिया संभाल रही हैं, वहीं नंदिनी, सुशीला, मीरा व अन्य कामगार व घरेलू हिंसा पीड़ित महिलाओं की समस्याओं का समाधान तलाशने में जुटी हैं। दीप्ति कहती हैं कि हम चाहते हैं कि लोग इतने जागरूक हो जाएं कि वे खुद अपनी मुश्किलों का हल तलाश लें। नागरिक सुविधाओं का हक दिलाने का जिम्मा भी इन्होंने ले रखा है।
वक्त नए नेतृत्व का: एडवा की संयुक्त सचिव मधु गर्ग का कहना है कि मैं एडवा से 1984 से जुड़ी हूं। हम लोगों ने एक बड़ा रास्ता तय किया है। समस्याएं आज भी गंभीर बनी हुई हैं, ऐसे में आने वाले कल के लिए नया नेतृत्व तैयार करना जरूरी हो गया है। नए बच्चे कहीं ज्यादा संवेदनशीलता के साथ महिलाओं के हक में आगे कदम बढ़ा चुके हैं। एडवा की युवा टीम इसका एक उदाहरण है।
बेहतर कल की खातिर नौकरी के घंटों में नहीं बांधा
सोनल श्रीवास्तव, गरिमा, नेहा और नीलम, वन स्टाप सेंटर/आशा ज्योति केन्द्र में बतौर काउंसलर व स्टाफ नर्स साल भर पहले जुड़ीं थीं। तब से आज तक 600 से अधिक मामलों में काउंसिलिंग कर चुकी हैं और चिकित्सकीय सुविधाएं प्रदान कर चुकी हैं। यूं तो इनकी नौकरी आठ घंटे की है, पर साल में शायद ही कोई समय ऐसा रहा होगा, जब इन्होंने इन बंधे-बंधाए घंटों से खुद को बांधा हो। रात-दिन में कभी फर्क नहीं किया। कभी-कभी तो ड्यूटी से घर पहुंचने के तुरंत बाद दोबारा मोबाइल पर आई एक कॉल के साथ रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए निकल जाती हैं। सोनल कहती हैं कि एक महिला होने की पीड़ा को महसूस करना होगा, तभी हम एक बेहतर समाज बना सकेंगे। इसके लिए हमें नौकरी को घंटों में बांधना नहीं होगा।