मातृभाषा में उन्नति की राह दिखा रहे शिक्षक, बोले- हिंदी में सबको जोड़ने की अनोखी कला
भाषाविदों और लोकगीतों पर काम कर रहे प्रो. योगेंद्र
लखनऊ विश्वविद्यालय में हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग के अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र सिंह ने हिंदी भाषाविदों को लेकर लेखन में बड़ा काम किया है। साथ ही वे दस हिंदी भाषी प्रदेशों के लोकगीतों के संकलन पर भी काम कर रहे हैं। प्रो. योगेंद्र के संरक्षण में 30 से ज्यादा विद्यार्थी शोध कर चुके हैं। बहुत से छात्र नेट-जेआरएफ में सफल हुए तो सैकड़ों छात्र हिंदी विषय से पढ़ाई कर अच्छे पदों पर आसीन हैं। इनमें प्रशासनिक सेवा से लेकर अन्य विभागों के अधिकारी शामिल हैं।
वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की स्थिति सुखद
प्रो. योगेंद्र सिंह मानते हैं कि शिक्षा का चाहे जितना अंग्रेजीकरण हो गया हो लेकिन वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की स्थिति बहुत सुखद है। पूरे विश्व में हिंदी और हिंदी साहित्य में बहुत काम हो रहा है। प्राइमरी से लेकर विवि स्तर तक और प्रशासनिक व अन्य विभागों में हिंदी रोजगार की भाषा बन रही है। अब तो हिंदी में नए-नए शोध कार्य हो रहे हैं। प्रो. योगेंद्र कहते हैं कि पूरे भारत को एकीकृत करने के लिए मातृभाषा हिंदी बहुत जरूरी है। जहां तक बच्चों का प्रश्न है तो हिंदी में कम अंक आने वाले छात्र और उनके अभिभावक इसे मातृभाषा मानकर हिंदी विषय पर कम ध्यान देते हैं जबकि गणित व अन्य विषयों के ट्यूशन लगाते हैं। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति से मातृभाषा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी।
राजकीय हाईस्कूल खंदारी बीकेटी से सेवानिवृत्त शिक्षक डॉ. शिवमंगल सिंह ‘मंगल’ अब तक हिंदी और बुंदेली भाषा में दस से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से उन्हें मैथिली शरण गुप्त सम्मान से पुरस्कृत भी किया जा चुका है। उनकी पुस्तकों पर शोध भी हुआ है। हिंदी को रोजगार की भाषा बनाये जाने के शुरू से पक्षधर रहे डॉ. शिवमंगल सिंह कहते हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में जब तक हिंदी को अनिवार्य नहीं किया जाएगा तब तक युवाओं का अपेक्षाकृत झुकाव हिंदी की ओर नहीं होगा। उनका मानना है कि अन्य प्रांतों में भी हिंदी को अनिवार्य किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि पिछली सरकारों की नीतियां भी अंग्रेजी को बढ़ावा देने वाली रही हैं। नई शिक्षा नीति से जरूर कुछ उम्मीद जगी है, लेकिन इसका पूरी तरह पालन होने से ही सफलता मिल सकेगी। उन्होंने कहा कि ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की तरह अगर मीडिया जागरूकता कार्यक्रम चलाए तो भी काफी सुधार की आशा है।
इसी वर्ष जूनियर हाईस्कूल से सेवानिवृत्त डॉ. रामबहादुर मिश्र ने अपने छात्रों में हिंदी के प्रति रुचि को बढ़ावा देने के लिए निबंध लेखन व काव्य लेखन जैसी प्रतियोगिताओं का सहारा लिया। उनका यह प्रयोग काफी सफल रहा। वर्ष 2016 में उनकी उपलब्धियों के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। हिंदी और अवधी भाषा के उत्थान के लिए उन्होंने दस से ज्यादा देशों की यात्राएं कीं। कई देशों में उन्हें सम्मानित किया गया। एक दर्जन किताबें लिख चुके और इतनी ही पुस्तकों का संपादन कर चुके डॉ. मिश्र को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से उनकी पुस्तकों के लिए चार बार सम्मानित किया जा चुका है। विद्यालयों में हिंदी शिक्षकों को कमी पर चिंता जताते हुए कहा, हिंदी के विकास के लिए सम्मिलित प्रयासों की जरूरत है। डॉ. मिश्र ने कहा कि अमर उजाला का ‘हिंदी हैं हम’ अभियान मातृभाषा के उत्थान के लिए चलाया जाने वाला मेरी याददाश्त में सबसे सफल प्रयोग है। ऐसे अभियान ही हिंदी के विकास में सहायक सिद्ध होंगे।
एसकेडी एकेडमी इंटर कॉलेज, राजाजीपुरम में हिंदी के प्रवक्ता राजेंद्र शुक्ल अपने विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए शिक्षण के साथ ही नए प्रयोग भी करते हैं। वे बताते हैं कि मैंने अपनी कक्षाओं में सदैव हिंदी को बच्चों के समक्ष रुचिकर रूप में रखा, उन्हें विभिन्न उदाहरणों से बताता हूं कि यह भाषा संस्कृत की दुहिता होने के नाते सर्वाधिक वैज्ञानिक है और जीवन को गरिमामय ढंग से जीने का सलीका भी सिखाती है। बताया, हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए मैंने अपने विद्यालय में पाठ्यक्रम में शामिल कई कहानियों की पटकथा लिखकर उनका मंचन भी बच्चों द्वारा कराया है। वे बताते हैं कि इंटरमीडिएट की पढ़ाई समाप्त करते-करते प्रतिवर्ष एक-दो बच्चे कवि या लेखक के रूप में अपनी भावनाओं को कागज पर उतारना शुरू कर देते हैं।
अमर उजाला का अभियान प्रेरणादायी
वे कहते हैं कि अमर उजाला का ‘हिंदी है हम’ अभियान देश भर के हिंदी सेवियों और हिंदी प्रेमियों के लिए प्रेरणादायी है। लगभग दो दशकों से मैंने हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग का अभियान चला रखा है।