घूमफिर फिर एक बार फिर 25 दिसंबर की तारीख आ गई, पर वह बात नहीं जो हर साल इस दिन खास तौर से लखनऊ में दिखाई देती थी। न ‘तुम जियो हजारों साल...’ का गीत गूंजेगा न दीर्घायु व स्वस्थ होने की कामना करने वाली होर्डिंगें हैं। आयोजन तो आज भी हो रहे हैे हवन-पूजन भी हो रहा है, अटल की तस्वीर भी है, पर लंबी उम्र नहीं बल्कि उनकी आत्मा की शांति के लिए। अस्वस्थता के चलते अटल एक दशक से लखनऊ नहीं आये थे, बावजूद इसके लखनऊ वालों को भरोसा रहता था कि किसी न किसी 25 दिसंबर का सूरज काल के कपाल पर लिखकर मिटा देने वाले और मौत से ठान लेने वाले उनके प्रिय नेता अटल के आने का संदेश लेकर जरूर आएगा। पर, ऐसा न हुआ। लखनऊ को कभी निराश न करने वाले अटल 2007 में ‘लौटके आऊंगा लखनऊ’ के वायदे पर नियति के निर्णय के चलते ‘अटल’ नहीं रह सके। पर, यह अटल है कि लखनऊ में उनका काम और नाम हमेशा ‘अटल’ रहेगा।
लखनऊ को अपनी 'यशोदा' कहते थे अटल जी, यहीं किए विकास के प्रयोग और फिर देश भर में लागू किया
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लखनऊ अटल की जन्मभूमि नहीं, पर पता नहीं वह क्या बात थी जिसके चलते लखनऊ और अटल जीवन भर एक-दूसरे के पर्याय बने रहे। आगरा के बटेश्वर के अटल को लखनऊ ने ऐसा मोहा कि वे इसे ‘यशोदा’ कहने लगे। इस शहर ने अटल को संघ के जीवनव्रती कार्यकर्ता के रूप में देखा तो एक प्रचारक के रूप में भी देखा। कवि व पत्रकार के रूप में अंग्रेजों की नीतियों का प्रतिरोध करते देखा तो आपातकाल के आंदोलन की अगुवाई कर जेल जाते हुए भी। जनसंघ ने जब अटल के जरिये दिल्ली की संसद की दहलीज लांघने की रणनीति बनाई तो भी उन्होंने लखनऊ को चुना। वैसे तो लखनऊ ने पहली कोशिश में अटल की इच्छा पूरी नहीं होने दी, लेकिन जब सांसद बनाया तो नेता प्रतिपक्ष और फिर प्रधानमंत्री बनाने का भी इतिहास रच दिया। अटल कहते भी थे... वाह रे लखनऊ... नहीं दिया तो नहीं दिया। देना शुरू किया तो झोली भर दिया। अक्सर कहते थे, ‘मैं भी पक्का नखलऊवा हूं। इतनी जल्दी पिंड छोड़ने वाला नहीं।’
अटलजी ने लखनऊ को अपनी ‘यशोदा’ कहा भर नहीं, बल्कि निभाया भी। सांसद रहे, नेता प्रतिपक्ष रहे या प्रधानमंत्री... लखनऊ से उनका नाता कभी खत्म नहीं हुआ। प्रधानमंत्री बने तो लखनऊ उनके कामों की प्रयोगशाला बन गया। हर योजना और हर काम का परीक्षण पहले लखनऊ में किया। सफल होने के बाद उसे देश भर में लागू किया... प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, पांच, दस और 15 रुपये रोज पर गरीबों को मकान, किसान क्रेडिट कार्ड, राष्ट्रीय राजमार्गों का सुदृढ़ीकरण और चौड़ी सड़कें। अटल ने लखनऊ के विकास और लागों के स्वास्थ्य, शिक्षा खासतौर से लड़कियों की शिक्षा के लिए जितना काम किया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। अटल जब लखनऊ से सांसद चुने गए तब महोना विधानसभा में न तो सड़कें थीं और न अस्पताल। उन्होंने 1991 में लखनऊ में ‘सड़क में गड्ढे या गड्ढे में सड़क’ का चर्चित भाषण दिया। जीतने के बाद उन्होंने सड़कों को गड्ढों से निकालने का अभियान चलाया तो लखनऊ की तस्वीर बदलने लगी।
वर्ष 1991 में जब वे लखनऊ से सांसद चुने गए तब लड़कियों की शिक्षा के लिए गोमती के इस पार कोई कॉलेज नहीं था। गोमती के उस पार अर्थात 1975 के बाद विकसित हुए लखनऊ में भी ऐसा ही हाल था। उन्होंने न सिर्फ लड़कियों की हाईस्कूल और इंटर की पढ़ाई के लिए स्कूल खुलवाए बल्कि गोमती के दोनों तरफ दो सरकारी डिग्री कॉलेज भी स्थापित कराए। प्रधानमंत्री बने तो तत्कालीन राज्य सरकार से कहकर हर ब्लॉक में लड़कियों के लिए एक हाईस्कूल की योजना शुरू कराई। लखनऊ को जाम से निजात दिलाने के लिए कई जगह फ्लाई ओवर का निर्माण हुआ। लखनऊ में रिंग रोड और शहीद पथ बनवाकर पूर्वांचल से पश्चिम को जाने वाले भारी वाहनों के शहर के बाहर से निकल जाने की राह खुलवाई।