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Lalji Tandon Death: लखनऊ तुम पर फिदा और तुम फिदा-ए-लखनऊ, जानें कैसे बने 'लल्लू' से सबके 'लालजी'

अखिलेश वाजपेयी, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Tue, 21 Jul 2020 10:44 AM IST

सार

  • सियासत के ही नहीं कुश्ती के अखाड़े के भी रहे पहलवान
  • लखनऊ की तस्वीर बदली, शिया-सुन्नी विवाद का कराया समाधान
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लालजी टंडन
लालजी टंडन - फोटो : सोशल मीडिया

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विस्तार

कन्नौज की माटी से रिश्ता रखने वाला आम बालक चौक की गलियों में घूमते-घूमते और ज्वाला मस्त के अखाड़े में दांव-दांव लगाते-लगाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक 'लल्लू ' से लखनऊ व यूपी वालों के ही नहीं सियासी दुनिया के लिए कब व कैसे 'लालजी' बन गया, इसकी कहानी खासी दिलचस्प है। लल्लू नाम क्यों पड़ा? तो टंडन ने एक बार स्वयं ही बताया था कि छोटी संतान होने के नाते सभी लोग उन्हें प्यार से 'लल्लू' कहने लगे थे। बड़े होने पर आसपास के लोग उन्हें लालजी नाम से पुकारने लगे।
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लल्लू से बाबू जी

भले ही लोगों ने उन्हें यूं ही लालजी नाम से पुकारना शुरू कर दिया हो लेकिन वह लखनऊ के लिए वास्तव में 'लाल' (बेशकीमती) जैसे ही थे और लखनऊ उन्हें भी अपने 'लाल' (पुत्र) जैसा प्रिय था । उनका सफर सिर्फ लल्लू से लालजी टंडन पर ही आकर नहीं रुका बल्कि छोटों के लिए वहआगे चलकर 'बाबू जी' भी बन गए। लोग उन्हें सिर्फ 'बाबू जी' कहकर संबोधित ही नहीं करते थे बल्कि उनका व्यवहार भी 'बाबू जी' जैसा था। गलती हुई तो डांट मिली गुस्सा कम हुआ तो समझाने लगे। वर्ष 2009 में टंडन के सांसद चुने जाने के बाद भाजपा ने उनकी राजनीतिक विरासत लखनऊ पश्चिम से अमित पुरी को उम्मीदवार बनाकर सौंपी थी।


पुरी बताते हैं कि बाबू जी की जेब एक तरह से भाजपा के नौजवानों एवं विद्यार्थी परिषद में काम करने वाले कई साथियों जो प्रदेश में कैबिनेट मंत्री और केंद्र में सांसद तक बने, के लिए अपनी गुल्लक जैसी थी। 'बाबू जी' का पितृवत स्नेह जेब से रुपया निकालते इन लोगों का हाथ पकड़कर रोकता भी नहीं था। वह कभी पीठ तो कभी गाल पर धौल जमाते थोड़ा बनावटी गुस्सा दिखाते और मुस्कराते हुए कहते थे, 'तुम लोग सुधरोगे नहीं। ' मुस्कराते हुए और हंसते हुए छोटों से स्नेहपूर्ण व्यवहार और हम उम्र लोगों से बेलौस हंसी-मजाक करने वाले टंडन की जिंदगी प्रेरक इस मायने में मानी जाएगी कि उन्होंने जिंदगी के सारे सरोकारों को छुआ ।

हर सरोकार का ख्याल
वह ऐसे राजनेता थे जिन्होंने पत्रकारिता व साहित्य में भी कलम आजमाई। आंदोलनकारी और सियासी घटनाक्रमों के सूत्रधार भी रहे। क्रांतिकारियों व वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सरोकारों से भी वह हमेशा जुड़े दिखे। बड़े व व्यस्त राजनेता होने के बावजूद साहित्यकारों की मंडली के साथ सहज भागीदारी, रामलीला के आयोजनों से सीधा सरोकार तो होली के जुलूस में आम आदमी जैसे उत्साह से भागीदारी ।

गंदी हो रही गोमती को सजाने व संवारने के साथ उसे स्वच्छ करने की चिंता तो लखनऊ में अखाड़ों की खत्म हो रही परंपरा की टीस के साथ उन्हें लखनऊ के कथक घरानों की लखनऊ से हो रही दूरी, भांट और शोहदों जैसे दृश्यों के लखनऊ से गायब होने के दर्द उन्हें आम राजनेताओं से अलग ख़ड़ा करते थे । लखनऊ के सरोकारों, संस्कृति और इतिहास से जुड़ा शायद ही कोई पहलू ऐसा रहा हो जो उनके दिलों की धड़कन में न धड़कता रहा हो । यहां तक काफी हाउस पर भी जब-जब संकट आया तो टंडन उसे बचाने के लिए आगे खडे़ दिखे।

लखनऊ की विरासत बचाने का सवाल हो या यहां की संस्कृति संवारने का अथवा इस शहर का सही इतिहास नई पीढ़ी को बताने की चिंता, टंडन सभी जगह खुद आगेऔर जिम्मेदारी को कंधे पर उठाए नजर आए । वैसे उन्होंने लखनऊ की विरासत और समृद्ध सांस्कृतिक सरोकारों से नई पीढ़ी को परिचित कराने के लिए 'अनकहा लखनऊ' नाम से एक किताब भी लिखी लेकिन उनका इरादा लखनऊ का विस्तृत इतिहास लिखने का भी था । कई बार इस पर बात भी की । काम भी शुरू किया था लेकिन वह पूरा हुआ या नहीं , इसका पता अभी नहीं है ।
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लखनऊ की विरासत पर गर्व

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