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महिला वैज्ञानिकों ने साझा की संघर्ष की कहानियां, कहा- जुगाड़ विद्या में माहिर होती हैं महिलाएं

Mon, 08 Oct 2018 03:43 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 08 Oct 2018 03:43 PM IST
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lady scientists shared their experience in science fest in lucknow
महिला वैज्ञानिक - फोटो : amar ujala
अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव में देश-विदेश से जुटी महिला वैज्ञानिकों ने अपने संघर्ष, सफलता व उपलब्धियों के अनेक रोचक और प्रेरक किस्से साझा किये हैं। कई ने उस पल को भी याद किया, जब वह 40 पुरुष वैज्ञानिकों की भीड़ में अकेली थीं। पर उन्हें उम्मीद है महिला व पुरुष वैज्ञानिकों के बीच का यह अंतर धीरे-धीरे ही सही पर मिटेगा जरूर। उन्हें विश्वास है कि देश को मजबूत बनाने में महिला वैज्ञानिकों की अहम भूमिका होगी। इस दौरान प्रदेश भर से आई महिलाएं व छात्राएं तन्मयता से उनकी हर एक बात सुनती रहीं। कई बच्चियों ने सवाल भी किए। मंच से इन वैज्ञानिकों के नीचे आते ही छात्राएं उन्हें शुक्रिया अदा करती दिखीं। पेश है महिला वैज्ञानिकों की कहानी, उनकी जुबानी...
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प्रो. इंदिरा घोष - फोटो : amar ujala
बुरी चीज आसान और अच्छी चीज होती है कठिन

मैं हरियाणा में पैदा हुई। मेरे जन्म के वक्त क्या माहौल रहा होगा, मुझे पता नहीं। मेरा पालन-पोषण परंपरागत संयुक्त परिवार में हुआ। हर परिवार की तरह मेरे परिवार में भी सिर्फ बेटों की चाहत थी। मेरे भी दो भाई हैं, पर मेरी जिंदगी बिंदास थी। मेरे साथ मेरी दादी थीं, वही मेरी आदर्श हैं। उसकी यह बात हमेशा याद रहती है कि बुरी चीज आसान और अच्छी चीज हमेशा कठिन होती होती है। यही मैं सबको बताती हूं। मैं चाहती हूं कि शिक्षक रोजमर्रा की घटनाओं को विज्ञान से जोड़कर समझाएं। तभी बच्चों में उत्सुकता पैदा होगी और साइंस फन हो जाएगा। अरविंद गुप्ता का साइंस टॉय विज्ञान को मजेदार बनाने का बेहतरीन उदाहरण है।
-प्रो. इंदिरा घोष, पूर्व डीन, स्कूल ऑफ कम्प्यूटेशनल एंड इंटरग्रेटिव साइंस, जेएनयू, नई दिल्ली
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डॉ सुचित्रा बनर्जी - फोटो : amar ujala
‘जुगाड़’ विद्या में माहिर होती हैं महिलाएं

महिलाएं चुटकी में घर की किसी समस्याओं का समाधान निकाल लेती हैं। उनकी इसी क्षमता को मैं ‘इमोशनल कौशिएंट’ यानी ‘जुगाड़’ कहती हूं। मेरा बच्चा जब छोटा था और घर में अकेली होती थी, तब खाना बनाने के समय उसे एक खाली टब में खिलौनों के साथ छोड़ देती थी। इससे मेरा काम आसानी से हो जाता था। इसी तरह हर घर में महिलाएं जुगाड़ से अपना काम बना लेती हैं। ऐसे में महिलाएं किसी भी फील्ड में कुछ भी कर सकती हैं। मैं आज के बच्चों से यही कहूंगी कि जो काम आप कर रहे हैं, उससे प्यार कीजिए और मन से कीजिए। जिस दिन काम बोझ बन जाएगा, फिर वह काम नहीं होगा। आप अपनी जिंदगी की प्राथमिकता खुद तय करें।
-डॉ. सुचित्रा बनर्जी, वरिष्ठ वैज्ञानिक, नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (नासी), सीएसआईआर-सीमैप, लखनऊ
 
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डॉ अनुपम एस - फोटो : amar ujala
तेल के सूख चुके कुएं से फिर निकलेगा तेल

डीजल-पेट्रोल की बढ़ती कीमत के बीच युवा वैज्ञानिक डॉ. अनुपमा एस इंजीनियर का प्रोजेक्ट राहत देने जैसा है। वह बताती हैं कि देश में तेल के जो कुएं सूख गए हैं, उनसे भी तेल निकालने की कवायद में उनकी टीम जुटी है। इसके लिए उनकी टीम ऐसे माइक्रो आर्गेनिज्म विकसित करने में जुटी है, जिनके विकसित होने पर गैस या दूसरे तत्व पैदा होंगे, जिससे तेल ऊपर आ जाएगा। 
-डॉ. अनुपमा एस. इंजीनियर, माइक्रोबायोलॉजिस्ट 
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प्रो. चंद्रिमा साहा - फोटो : amar ujala
पापा नहीं पढ़ सके थे विज्ञान, मुझे बना दिया वैज्ञानिक 

घर के हालात ऐसे नहीं थे कि पापा विज्ञान की पढ़ाई कर सकते थे। मगर उन्होंने यह ठान लिया था कि बेटी की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देंगे। मेरे पिता शंभू साहा पश्चिम बंगाल के मशहूर फोटोग्राफर थे। उनका साथ मिला और मैं वैज्ञानिक बन गई। फिर भी यह कहूंगी कि विज्ञान वही पढ़ेगा, जिसकी इसमें रुचि होगी और उसे जानने की भूख होगी। इसमें टीचर्स और साइंटिस्ट की भूमिका बेहतर हो सकती है।
-प्रो. चंद्रिमा साहा, पूर्व निदेशक, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इम्यूनोलॉजी
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