यूं शुरू हुआ कामयाबी का सफर, बुलंद इरादों से बने 'मोमोज किंग', जानें- इनकी दिलचस्प कहानी

न्यूज डेस्क/अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 20 Jul 2019 04:40 PM IST
रंजीत
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कोई धंधा छोटा या बड़ा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता। इसी मशहूर डायलॉग को अपनी जिंदगी में उतारा शहर में ठेला लगा कर मोमो बेचने वाले एक शख्स ने। गरीबी की अंधेरी गलियों से निकलकर देश के कई महानगरों में मोमो की चेन चलाने वाले इस इंसान का नाम है रंजीत सिंह। जी हां, सही पहचाना आपने ‘नैनीताल मोमोज’ के ओनर रंजीत। उनसे बात करके उनकी सफलता की कहानी जानने की हमने कोशिश की, पेश है उसके कुछ अंश :
रंजीत
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रंजीत बताते हैं कि जिंदगी जीने के लिए पैसे बहुत जरूरी होते हैं। बचपन से ही ये बात हमको पता थी। इसकी वजह थी हमारी गरीबी। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में आने वाले नलाई तल्ली गांव में पैदा हुआ था। मेरे पापा हम सबकी जरूरतें पूरी करने की पूरी कोशिश करते पर ज्यादातर उनकी कोशिश नाकामयाब रहती। मिठाई और नए कपड़े जैसी चीजें हम लोगों के लिए सपना थीं। जिंदगी एक बोझ की तरह लगती थी।

 
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रंजीत
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लखनऊ आने की कहानी
मुझे लगा कि अगर गांव में रहा तो ऐसी मुफलिसी की जिंदगी मुझे भी बितानी पड़ेगी। मां-पापा से आशीर्वाद और नसीहत ली। मां ने कहा ‘ बेटा जो कुछ भी करना, मेहनत और ईमानदारी से करना, गांव और परिवार का नाम खराब न करना’। सीख की ये पूंजी लेकर जुलाई 1997 में लखनऊ आ गया। बहुत तलाश किया, लोगों की खुशामद की पर कोई मुझे काम पर रखने को राजी नहीं हुआ। आखिरकार भगवान को मुझ पर तरस आ गया और एक कोठी में हेल्पर की नौकरी मिली। इतने कम पैसे मिलते कि मेरा गुजारा बड़ी मुश्किल से होता। खैर थोड़े दिन बाद महानगर में एक जगह वेटर का काम मिल गया। यहां की पगार पहले से बेहतर थी और मुफ्त में खाना भी मिलता था। महीनों तक पैसे बचा-बचा कर रखता और उन्हें घर भेजता। इसी दौरान एक हादसे में मेरे एक साथी का काम करने के दौरान हाथ जल गया। मालिक ने सहानुभूति तो दूर उसे नौकरी से ये कह कर निकाल दिया कि जले हाथ से कैसे दूसरों को खाना परोसेगा।
प्रतीकात्मक तस्वीर
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मैं बुरी तरह डर गया और काम छोड़कर खुद की चिड़ियाघर के सामने पूड़ी-सब्जी की दुकान लगाई। सुबह से शाम तक महज चालीस रुपये की कमाई हुई। समझ गया कि ये नहीं चलने वाला। अब इन चालीस रुपयों से चाऊमीन और उसमें पड़ने वाली सब्जियां खरीदी और चाऊमीन का ठेला लगाया। इस बार राणा प्रताप मार्ग पर ठेला लगाया। बहुत कम ग्राहक आए, मगर पूरे दिन में 280 रुपये की कमाई हुई। इस कमाई से मेरा हौसला तो बढ़ा पर संतुष्टि नहीं मिली। खैर इस काम को जारी रखते हुए मैंने मार्केट रिसर्च की। लगा कि बहुत कम लोग हैं जो लखनऊ में मोमो के स्वाद को जानते हैं। पता नहीं क्यों मैंने चाऊमीन के साथ 2008 में मोमो बेचना भी शुरू कर दिया। शुरुआत में इसका स्वाद लोगों को अच्छा ही नहीं लगता था। बहुत कम लोग थे जो इसकी डिमांड करते। तब मैंने इसका अंदाज बदलना शुरू किया। फ्राइड मोमो, सूप में पड़े मोमो जैसा कुछ डिफरेंट किया जो लोगों को थोड़ा पसंद आने लगा।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
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आखिरकार गोमती नगर में एक छोटी सी दुकान ली। लोगों के टेस्ट को देखते हुए स्टीम के अलावा तंदूरी मोमो शुरू किए। फिर ड्रैगन फायर, चीज, चॉकलेट जैसे स्वादों में मोमो ग्राहकों को पेश किए। हर ग्राहक से पूछता कि ऐसा क्या करूं कि आपको ज्यादा पसंद आए। उनके सुझावों को ईमानदारी से अमल किया। आज लगभग 54 तरह के मोमों की वैराइटी देते हैं। टेस्ट के लिए हम लगातार इनोवेशन करते रहते हैं। यहां तक कि अगर किसी ग्राहक ने कोई ऑर्डर दिया और उसे टेस्ट पसंद नहीं आया तो वो उसे वापस करके अपने मन मुताबिक ऑर्डर दे सकता है। मेरा मानना है कि लोगों का प्यार ही मेरी पूंजी है। उन्हीं की मोहब्बत की बदौलत आज लखनऊ में मेरे चार आउटलेट हैं। गोवा, इलाहाबाद, कानपुर जैसे शहरों में फ्रेंचाइजी है। अगले महीने दिल्ली, गोरखपुर, बनारस और रांची में भी फ्रेंचाइजी खुलने वाली है।
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