वर्ष 2020 चिकित्सक और चिकित्साकर्मियों की सेवा भावना के लिए भी जाना जाएगा। कोरोना से बचाव के तमाम संसाधन प्रयोग करने के बाद भी ये इससे बच नहीं पाए। अकेले केजीएमयू में 2000 से अधिक लोग वायरस की चपेट में आए। लेकिन इन सबके बावजूद चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों ने हार नहीं मानी। पेश हैं जुनून की कुछ ऐसी ही मिसालें।
Year Ender 2020: कोरोना से हम इसलिए जीतते गए ...क्योंकि इन्होंने नहीं मानी हार
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मां की तबीयत ठीक नहीं थी, फिर भी पति-पत्नी मरीजों के इलाज में जुटे रहे
केजीएमयू के ही दूसरे चिकित्सक हैं बजाज दंपती। रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दर्शन बजाज दूसरी टीम के अगुवा के रूप में मैदान में उतरे। डॉ. बजाज की पत्नी डॉ. मोना बजाज क्वीन मेरी में गायनेकोलॉजिस्ट हैं। जिस वक्त दर्शन बजाज ड्यूटी पर जा रहे थे तो डॉ. मोना घबराई हुई थीं। हालांकि, वह हौसला बढ़ाती रहीं और खुद भी कोरोना वार्ड में आने वाली महिलाओं के इलाज में जुट गईं।
पति-पत्नी के वार्ड में ड्यूटी में होने के दौरान मां व दोनों बच्चे घर में अकेले रहते। वह बताते हैं कि अब तक के कॅरियर में यह ड्यूटी सबसे कठिन और विचलित कर देने वाली थी। क्योंकि मां और बच्चे दोनों की तबीयत ठीक नहीं थी, लेकिन यह दौर भी धीरे-धीरे बीत गया। वह इन दिनों फिर वार्ड ड्यूटी में जुटे हुए हैं।
पति केजीएमयू में तो पत्नी एसजीपीजीआई में डटी रहीं
केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. हिमांशु की पत्नी डॉ. दीपाली एसजीपीजीआई में कार्डियोलॉजिस्ट हैं। राजधानी में कोरोना के कदम पड़ने पर मुकाबले के लिए सबसे आगे आने वाली टीम के अगुवा डॉ. डी. हिमांशु रहे हैं। वह केजीएमयू के संक्रामक रोग नियंत्रण प्रभारी भी हैं।
11 मार्च को पहले मरीज में लक्षण मिलने के बाद वह तत्काल अपनी टीम के साथ इलाज में जुट गए। सबकुछ इतना आसान नहीं था। डॉ. डी. हिमांशु शुरुआती दौर में घर जाते थे। उस दौरान उन्होंने अपने बच्चे को पिताजी के साथ रखा। बाद में क्वारंटीन होना पड़ा। पत्नी की ड्यूटी एसजीपीजीआई में लगी तो उन्हें भी घर से अलग रहना पड़ा, लेकिन दोनों ने हौसला बनाए रखा। इस बीच पिता व बच्चे को घर पर छोड़ पति-पत्नी मरीजों की सेवा में जुटे रहे।
दोस्तों में लगी वार्ड ड्यूटी की होड़
जिस वक्त लोग कोरोना से बेहद डरे हुए थे उस दौरान एसजीपीजीआई के रेजिडेंट डॉक्टरों में कोरोना वार्ड में ड्यूटी करने की होड़ लगी हुई थी। डॉ. अजय शुक्ला, डॉ. आकाश माथुर, डॉ. अनिल गंगवार सहित अन्य रेजिडेंट डॉक्टरों ने पूरी तल्लीनता से वार्ड में ड्यूटी की। वे त्योहारों पर यह संकल्प लेते थे कि वार्ड में भर्ती होने वाले मरीजों को अपना परिजन मानकर इलाज करेंगे। रेजिडेंट डॉक्टरों के इस संकल्प का असर रहा कि एसजीपीजीआई में मरीजों की रिकवरी की दर में तेजी से इजाफा हुआ। इस दौरान रेजिडेंट डॉक्टरों ने वार्ड में ही त्योहार मनाए। यही स्थिति केजीएमयू के भी रेजिडेंट डॉक्टरों की रही। एक साथी के पॉजिटिव होने के बाद भी वे निरंतर वार्ड में डटे रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एके सिंह का कहना है कि यह साल पूरी तरह से कोरोना के नाम रहा। चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने पूरी तत्परता के साथ लोगों की सेवा की। वह अपनी जान की परवाह किए बिना अस्पताल में डटे रहे। इसी तरह अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाली पूरी मशीनरी भी कोरोना वायरस की रोकथाम में लगी रही। इस वजह से अन्य मरीजों के लिए इलाज की तकनीकी का विकास प्रभावित रहा है, क्योंकि सभी का फोकस पूरी तरह से करोना पर रहा है। राजधानी में आने वाले नए संस्थानों की व्यवस्थाएं भी प्रभावित रहीं। उम्मीद है नए साल में नई इबारत लिखी जाएगी।