'...और मैं 'जादू' से जावेद अख्तर बन गया'
‘न्यू हैदराबाद की जिस सड़क पर रहता था वहां 10-12 घर थे। कुछ कायस्थ परिवार थे, कुछ ठाकुर। 2 मुस्लिम और क्रिश्चियन और कुछ ब्राह्मण थे। बचपन में मुझे ऐसा माहौल मिला कि मुझे कभी होली दूसरे समुदाय का त्यौहार नहीं लगी।
'...और मैं 'जादू' से जावेद अख्तर बन गया'
बचपन का सबसे बड़ा मलाल था कि मुझे पीतल की पिचकारी नहीं मिल पाई। मेरे चचेरे भाई जो मुझसे 20-20 साल बड़े थे, होली पर उनके दोस्त घर में घुस आते और उन्हें खींचकर बाहर ले जाकर रंग देते थे। मोहर्रम होता तो कायस्थ परिवार अपना रेडियो धीमी आवाज में बजाते ताकि मुस्लिम परिवारों को परेशानी न हो। यही लखनऊ है और इसी लखनऊ ने मुझे तैयार किया है।
'...और मैं 'जादू' से जावेद अख्तर बन गया'
मैं अच्छा हूं, बुरा हूं, या जैसा भी हूं आप लखनऊ वालों को जिम्मेदार कहूंगा।’ भारत के जाने माने शायर जावेद अख्तर ने कुछ इन शब्दों में लखनऊ और यहां के लोगों से अपने साथ को समझाया। मौका था गोमतीनगर स्थित जयपुरिया संस्थान में भगवती चरण वर्मा के पौत्र चंद्रशेखर वर्मा के उपन्यास ‘कॉनर्स ऑफ अ स्ट्रेट लाइन’ के विमोचन का।
'...और मैं 'जादू' से जावेद अख्तर बन गया'
लखनऊ एक्सप्रैशंस संस्था द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में जावेद अख्तर के विचारों और उनकी कविताओं को सुनने बड़ी संख्या में लखनवी उमड़े और जावेद ने भी किसी को निराश नहीं किया।
'...और मैं 'जादू' से जावेद अख्तर बन गया'
कार्यक्रम का शुभारंभ जावेद अख्तर,लखनऊ एक्सप्रैशंस के संस्थापक जयंत कृष्णा और कनक रेखा ने पुस्तक के विमोचन से किया। इस मौके पर लेखक चंद्र शेखर वर्मा ने बताया कि वे अंग्रेजी में खुद को साबित करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इंग्लिश उपन्यास लिखा।