बड़ी आंत की गंभीर बीमारी अल्सरेटिव कोलाइटिस और इससे जुड़ी दूसरी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए एक राहत की खबर है। ऐसे मरीजों में न दवा काम करती है और न ही सर्जरी होती है। एक विकल्प बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट है, लेकिन वह बहुत महंगा है। ऐसे में पीजीआई ने मरीजों में गुड बैक्टीरिया ट्रांसप्लांट कर इलाज देने की तैयारी शुरू कर दी। इसमें स्वस्थ व्यक्ति के फिकल यानी मल से गुड बैक्टीरिया को निकालकर मरीज की आंत में डाला जाता है। फिलहाल एक मरीज में प्रायोगिक तौर पर गुड बैक्टीरिया ट्रांसप्लांट कर दिया गया है। तीन और मरीजों की काउंसलिंग भी हो चुकी है। इस प्रक्रिया को फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (एफएमटी) कहा जाता है। इस ट्रांसप्लांट के कर्ताधर्ता एसजीपीजीआई के गैस्ट्रोइंटेरोलॉजी विभाग के प्रो. यूसी घोषाल का दावा है कि एफएमटी करने वाले चिकित्सा संस्थानों में पीजीआई प्रदेश में पहला संस्थान है। देश में एम्स नई दिल्ली, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलेरी साइंस नई दिल्ली, दयानंद मेडिकल कॉलेज लुधियाना में यह प्रयोग किया जा चुका है।
आंत की गंभीर बीमारी से मिलेगी राहत, गुड बैक्टीरिया ट्रांसप्लांट से होगा इलाज, इतना आएगा खर्च
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आंत में डाले जाते हैं गुड बैक्टीरिया
हर व्यक्ति की बड़ी आंत में गुड और बैड बैक्टीरिया होते हैं। ये भोजन को पचाने और उसमें मौजूद तत्वों को निकालने में अहम भूमिका निभाते हैं। जिन लोगों में गुड बैक्टीरिया खत्म हो जाते हैं, उनकी पाचन शक्ति कमजोर होने लगती है। जो मरीज संक्रमण के चलते अल्सरेटिव कोलाइटिस और एंटीबायोटिक डायरिया सहित आंतों की तमाम बीमारियों से जूझने लगते हैं, उन्हें मरीजों कोे फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है।
आंत की गंभीर बीमारी से भी मिलेगी राहत
अल्सरेटिव कोलाइटिस बड़ी आंत की गंभीर बीमारी होती है। खून के साथ दस्त आना, पेट में दर्द और मरोड़ बना रहना, मलाशय में दर्द, मल त्याग कर आने के बाद तुरंत दोबारा जाने की इच्छा होना, वजन घटना, बुखार बना रहना, मुंह में छाले बने रहना इस बीमारी के शुरुआती लक्षण हैं। इसमें आंत की अंदरूनी परत में सूजन और जलन होती है। छोटे-छोटे छाले बनने लगते हैं। इसका असर पाचन तंत्र पर पड़ता है। शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होने लगता है। इससे मलाशय और मल नाली के कैंसर होने का खतरा रहता है। एफएमटी इस बीमारी से राहत दिलाएगा। इससे बचने के लिए हमेशा फाइबर युक्त भोजन करें। फल, सब्जी खाते रहें।
गुड बैक्टीरिया खत्म होने के बाद मरीजों में दवाएं काम नहीं करती हैं। ऑपरेशन का विकल्प भी नहीं होता है। ऐसे में बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट देना पड़ता है, लेकिन इसका एक बार का खर्च डेढ़ लाख रुपया है। यह ट्रीटमेंट हर सप्ताह देना पड़ता है। वहीं एफएमटी का खर्च 10 से 15 हजार रुपये ही आता है। इसकी सफलता दर करीब 70 फीसदी है, जबकि दवाओं से रिकवरी 30 फीसदी तक होती है।
ऐसे होता है ट्रांसप्लांट
इसमें स्वस्थ व्यक्ति का सुबह का फीकल लेते हैं। लैब में टेस्ट कर उसमें से अच्छी बैक्टीरिया निकाल लिया जाता है और उसका एक कैप्सूल बनाया जाता है। कैप्सूल को कोलोनोस्कोपी या इंडोस्कोपी के जरिये बीमार व्यक्ति की बड़ी आंत में डाल दिया जाता है। इसे हर हफ्ते करीब छह से आठ सप्ताह तक नियमित करना पड़ता है। पीजीआई में अभी एक मरीज में यह प्रयोग किया गया है। शुरुआती परिणाम अच्छे दिख रहे हैं।
दावा
- फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट करने वाला पीजीआई प्रदेश का पहला संस्थान
- देश में एम्स नई दिल्ली समेत तीन संस्थान कर रहे यह ट्रांसप्लांट